मिलीभगत से रौंदा गया इंसाफ!, तहसीलदार व एसडीएम (राजस्व) पर गंभीर आरोप, उच्च स्तरीय जांच की मांग, अदालत का दरवाजा खटखटाने को मजबूर महिला
Justice trampled by collusion! Serious allegations against the Tehsildar and SDM (Revenue), demand for a high-level investigation, woman forced to approach the court.
गरियाबंद /छुरा : छुरा नगर के वार्ड क्रमांक 12, झूलेलाल पारा निवासी गंगा ध्रुव का पैतृक संपत्ति विवाद अब राजस्व तंत्र पर सीधे सवाल खड़े कर रहा है. गंगा ध्रुव ने आरोप लगाया है कि तहसीलदार सतरूपा साहू और अनुविभागीय अधिकारी (राजस्व) सुश्री अंजली खलखो की कथित मिलीभगत के चलते उन्हें उनके वैधानिक अधिकार से वंचित कर दिया गया और वे कई सालों से इंसाफ के लिए भटकती रही हैं.
मिली जानकारी के मुताबिक वर्ष 2021 में माता-पिता की मौत के बाद परिवार की तकरीबन 7 एकड़ पैतृक कृषि भूमि, जिसमें खसरा नंबर 139/1 एवं 118 शामिल हैं. कच्चा मकान और बाड़ी (खाली प्लॉट) का बंटवारा किया गया.
आवेदिका गंगा ध्रुव का आरोप है कि इस बंटवारे में भाइयों को कच्चा मकान और खेती योग्य भूमि का बड़ा हिस्सा दिया गया. जबकि बहनों को सिर्फ बाड़ी के छोटे-छोटे टुकड़े देकर औपचारिकता पूरी कर दी गई. गंगा ध्रुव को भी एक छोटा प्लॉट मिला। जिस पर उन्होंने प्रधानमंत्री आवास योजना के तहत मकान बनाकर किसी तरह जीवन यापन शुरु किया.
पीड़िता का कहना है कि बंटवारे के समय उन्हें कानूनी जानकारी नहीं थी. जिसका फायदा उठाकर उनके साथ अन्याय किया गया. बाद में जब जमीन की बिक्री हुई. तब रजिस्ट्री के दौरान उनसे सहमति ली जाती रही. जिसे उन्होंने पारिवारिक भरोसे में दे दिया. अब उन्हें एहसास हुआ है कि इसी प्रक्रिया में उनका हक कमजोर कर दिया गया.
न्याय के लिए उन्होंने तहसील न्यायालय में आवेदन दिया. लेकिन उनका आरोप है कि वहां उनके मामले को गंभीरता से नहीं लिया गया. इसके बाद उन्होंने अनुविभागीय अधिकारी (राजस्व) के समक्ष अपील की. लेकिन वहां भी उन्हें राहत नहीं मिली.
गंगा ध्रुव ने गंभीर आरोप लगाते हुए कहा कि उनके मामले में तहसीलदार सतरूपा साहू और अनुविभागीय अधिकारी (राजस्व) अंजली खलखो की कार्यप्रणाली संदिग्ध रही और निष्पक्ष जांच नहीं की गई.
उनका कहना है कि “हम जैसे बेसहारा लोगों के लिए न्याय सिर्फ कागजों में है. असल में यहां पहुंच और प्रभाव ही चलता है.”
उन्होंने यह भी आरोप लगाया कि उनके मामले में तथ्यों की अनदेखी की गई और अगर सही तरीके से जांच होती तो उन्हें उनका वैधानिक हिस्सा जरूर मिलता.
कानूनी रूप से हिंदू उत्तराधिकार अधिनियम 1956 (2005 संशोधन) के तहत बेटियों को पैतृक संपत्ति में बराबरी का अधिकार मिलता है. इसके बावजूद अगर किसी महिला को उसके हिस्से से वंचित किया जाता है तो यह कानून के प्रावधानों के खिलाफ है.
अब गंगा ध्रुव ने पूरे मामले की उच्च स्तरीय जांच की मांग कर कहा कि अगर उन्हें जल्द इंसाफ नहीं मिला तो वे अदालत का दरवाजा खटखटाने को मजबूर होंगी.
उन्होंने प्रशासन से अपील किया कि उनके मामले की निष्पक्ष जांच कर उन्हें उनका हक दिलाया जाए और अगर किसी स्तर पर लापरवाही या पक्षपात हुआ है तो जिम्मेदार अधिकारियों के खिलाफ सख्त कार्रवाई की जाए.
यह मामला अब एक बड़े सवाल के रूप में सामने आया है- क्या आम और बेसहारा नागरिक को इंसाफ मिल पाता है या फिर व्यवस्था में प्रभाव और पहुंच ही आख़री फैसला तय करती है?
अब निगाहें प्रशासन पर टिकी हैं- क्या पीड़िता को न्याय मिलेगा या यह मामला भी अन्य मामलों की तरह फाइलों में दबकर रह जाएगा?
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