शासन-प्रशासन से बार-बार गुहार लगाकर थक चुके ग्रामीणों ने खुद उठाई जिम्मेदारी, प्रशासन की बेरुखी से चंदा जुटाकर श्रमदान करने मजबूर ग्रामीण
Villagers, weary of repeatedly pleading with the authorities, have taken matters into their own hands; faced with official apathy, they are compelled to raise funds and contribute voluntary labor.
गरियाबंद/छुरा : विकासखंड मुख्यालय से महज चार से पांच किलोमीटर की दूरी पर स्थित गांवों के ग्रामीणों को बारिश के दिनों में आवागमन की गंभीर समस्या से जूझना पड़ रहा है. कोगालबाहरा नाले पर लंबे समय से पुलिया नहीं होने की वजह से टेंगनाबासा से सिवनी रोड को जोड़ने वाला मार्ग बारिश के दौरान बेहद कठिन और जोखिम भरा हो जाता है. शासन-प्रशासन से कई बार मांग और गुहार लगाने के बाद भी जब समस्या का स्थायी समाधान नहीं हुआ तो आखिरकार धर्मपुर और राजपुर गांव के ग्रामीणों ने खुद ही जिम्मेदारी उठाने का फैसला किया.
ग्रामीणों ने आपसी एकजुटता दिखाते हुए कोगालबाहरा नाले पर वैकल्पिक पुलिया तैयार करने का काम शुरू किया. इसके लिए गांव के लोगों ने मिलकर चंदा जुटाया और आवश्यक कार्य में सहयोग किया. ग्रामीणों ने जहां अपनी मेहनत और श्रमदान दिया, वहीं निर्माण कार्य में लगने वाले संसाधनों के खर्च के लिए भी सामूहिक रूप से राशि चंदा की. ग्रामीणों की इस पहल से फिलहाल आवागमन के लिए एक वैकल्पिक रास्ता तैयार हो सका है.
कोगालबाहरा नाला- चार-पांच किलोमीटर की दूरी के लिए 15 किलोमीटर का सफर
ग्रामीणों की सबसे बड़ी परेशानी यह है कि कोगालबाहरा नाले पर पुलिया नहीं होने के कारण उन्हें छुरा विकासखंड मुख्यालय पहुंचने के लिए दूसरे मार्गों का सहारा लेना पड़ता है. इसके चलते करीब 15 किलोमीटर की दूरी तय करनी पड़ती है. वहीं जिस रास्ते से ग्रामीण सीधे पहुंच सकते हैं. वहां से विकासखंड मुख्यालय की दूरी महज चार से पांच किलोमीटर के आसपास है.
इसका सीधा असर स्कूली बच्चों, बुजुर्गों, किसानों, मजदूरों और रोजमर्रा के काम से ब्लॉक मुख्यालय आने-जाने वाले ग्रामीणों पर पड़ता है. बारिश के मौसम में स्थिति और भी ज्यादा खराब हो जाती है. नाले में पानी बढ़ने के बाद दोपहिया और चारपहिया वाहनों का आवागमन मुश्किल हो जाता है. कई बार ग्रामीण जोखिम उठाकर नाला पार करने को मजबूर होते हैं.
वाहनों में भी आती रहती है तकनीकी खराबी
ग्रामीणों का कहना है कि नाले में पानी कम होने की स्थिति में किसी तरह वाहन पार हो भी जाए तो रास्ते की स्थिति के कारण वाहनों में तकनीकी खराबी आने की समस्या बनी रहती है. कई बार वाहन बीच रास्ते में फंस जाते हैं. जिससे ग्रामीणों को अतिरिक्त परेशानी उठानी पड़ती है. आपात स्थिति में मरीजों को अस्पताल पहुंचाने और बच्चों को स्कूल भेजने में भी यह मार्ग बड़ी बाधा बन जाता है.
कोगालबाहरा नाला- बार-बार मांग के बाद भी नहीं बनी पुलिया
ग्रामीणों के अनुसार कोगालबाहरा नाले पर स्थायी पुलिया निर्माण की मांग नई नहीं है. धर्मपुर और राजपुर सहित आसपास के ग्रामीण लंबे समय से शासन-प्रशासन का ध्यान इस समस्या की ओर आकर्षित कराते रहे हैं. ग्रामीणों ने कई बार जिम्मेदार अधिकारियों और जनप्रतिनिधियों से मार्ग की समस्या दूर करने तथा नाले पर स्थायी पुलिया निर्माण कराने की मांग की. लेकिन अब तक उनकी मांग पूरी नहीं हो सकी.
जब लगातार मांग के बावजूद समस्या का समाधान नहीं हुआ तो ग्रामीणों ने किसी का इंतजार करने के बजाय स्वयं ही आगे आने का फैसला लिया. गांव के लोगों ने आपसी सहयोग से राशि चंदा की और श्रमदान कर वैकल्पिक पुलिया तैयार करने में जुट गए.
ग्रामीणों की एकजुटता बनी मिसाल
ग्रामीणों की यह पहल क्षेत्र में चर्चा का विषय बनी हुई है. मूलभूत सुविधा के लिए सरकारी व्यवस्था पर निर्भर रहने के बजाय ग्रामीणों ने सामूहिक प्रयास से तत्काल राहत का रास्ता निकालने की कोशिश की है. ग्रामीणों का कहना है कि उनका उद्देश्य किसी व्यवस्था का विरोध करना नहीं. बल्कि अपने बच्चों और गांव के लोगों की परेशानी को देखते हुए तत्काल आवागमन की सुविधा उपलब्ध कराना है.
हालांकि ग्रामीणों द्वारा बनाई गई यह वैकल्पिक पुलिया स्थायी समाधान नहीं है. बरसात में नाले का जलस्तर बढ़ने पर इसकी मजबूती और सुरक्षा को लेकर भी सवाल बने रहेंगे. ऐसे में ग्रामीणों ने शासन-प्रशासन से मांग की है कि इस अस्थायी व्यवस्था को स्थायी समाधान में बदला जाए और कोगालबाहरा नाले पर जल्द से जल्द मजबूत एवं स्थायी पुलिया का निर्माण कराया जाए.
अब ग्रामीणों का सवाल- जब चार किलोमीटर की दूरी है तो 15 किलोमीटर क्यों?
ग्रामीणों की समस्या सिर्फ एक पुलिया तक सीमित नहीं है. यह सीधे तौर पर शिक्षा, स्वास्थ्य, रोजगार और रोजमर्रा के आवागमन से जुड़ा विषय है. ग्रामीणों का कहना है कि जब उनके गांव से विकासखंड मुख्यालय की दूरी महज चार से पांच किलोमीटर है. तो पुलिया के अभाव में उन्हें करीब 15 किलोमीटर का चक्कर लगाने के लिए मजबूर होना पड़ता है.
ग्रामीणों की ओर से की गई यह पहल शासन-प्रशासन के सामने एक बड़ा सवाल भी खड़ा करती है कि क्या मूलभूत आवागमन की सुविधा के लिए भी ग्रामीणों को स्वयं चंदा जुटाकर और श्रमदान कर व्यवस्था खड़ी करनी पड़ेगी? अब ग्रामीणों को उम्मीद है कि उनकी इस पहल के बाद जिम्मेदार विभाग मामले को गंभीरता से लेते हुए नाले पर स्थायी पुलिया निर्माण की दिशा में ठोस कदम उठाएगा.
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