डिग्री का पता नहीं, हर बीमारी का इलाज तैयार!, कलेक्टर ने कराया सील, दोबारा संचालन का दावा, 10 दिन में दो मौतों के बाद स्वास्थ्य निगरानी पर उठे सवाल

No clue about the degree, yet a cure ready for every ailment! Sealed by the Collector, yet claims of resuming operations; questions raised regarding health monitoring following two deaths in 10 days.

डिग्री का पता नहीं, हर बीमारी का इलाज तैयार!, कलेक्टर ने कराया सील, दोबारा संचालन का दावा, 10 दिन में दो मौतों के बाद स्वास्थ्य निगरानी पर उठे सवाल

गरियाबंद : गरियाबंद जिला में अमलीपदर सामुदायिक स्वास्थ्य केंद्र के अंतर्गत आने वाले उरमाल के कश्यपपारा में एक कथित क्लिनिक के संचालन को लेकर सवाल खड़े हो रहे हैं. स्थानीय स्तर पर दावा है कि यह क्लिनिक पिछले करीब 5 साल से संचालित है. यहां इलाज करने वाले बै लोचन को लेकर भी सवाल उठ रहे हैं कि उनके पास मरीजों का इलाज करने के लिए आवश्यक चिकित्सा डिग्री और अनुमति है या नहीं..
क्लिनिक में मरीजों को दवा देने के साथ खून की जांच और इंजेक्शन लगाने का काम भी किए जाने की बात सामने आई है. खास बात यह है कि क्लिनिक में आने वाले कई मरीजों का कहना है कि यहां इलाज सरकारी अस्पताल की तुलना में सस्ता पड़ता है और जल्दी आराम मिलता है. इसी वजह से सुबह से ही यहां मरीजों की भीड़ देखी जाती है.
हर बीमारी में इंजेक्शन लगाने का आरोप
स्थानीय लोगों और मरीजों के मुताबिक क्लिनिक में सामान्य बीमारी से लेकर हड्डी और जोड़ के दर्द तक का इलाज किया जाता है. संचालक द्वारा कई बीमारियों के इलाज का दावा किए जाने की बात भी सामने आई है. आरोप है कि मरीजों को इलाज के दौरान दो से तीन तरह के इंजेक्शन तक लगाए जाते हैं.
इलाज, दवा और इंजेक्शन के लिए मरीजों से करीब 200 रुपए से लेकर 1 हजार रुपए तक लिए जाने की बात कही जा रही है. हालांकि इन दावों की आधिकारिक पुष्टि संबंधित स्वास्थ्य विभाग की जांच के बाद ही हो सकेगी.
छोटे कमरे में क्लिनिक, नियमों के पालन पर सवाल
कश्यपपारा में संचालित इस क्लिनिक का आकार भी काफी छोटा बताया जा रहा है. आरोप है कि यहां नर्सिंग होम एक्ट के तहत निर्धारित मानकों का पालन नहीं किया जा रहा है. वहीं, क्लिनिक में इलाज करने वाले व्यक्ति की शैक्षणिक योग्यता, पंजीयन और संचालन की अनुमति को लेकर भी सवाल उठ रहे हैं.
क्लिनिक संचालक बै लोचन से जब उनकी योग्यता और अनुमति के बारे में सवाल किया गया तो उन्होंने खुद को पैथोलॉजिस्ट बताया. उनका कहना था कि मरीज खुद इंजेक्शन लेकर आते हैं और वे सिर्फ उसे लगा देते हैं. अनुमति होने की बात भी उन्होंने कही, लेकिन दस्तावेज दिखाने से इंकार किया.
2019 में तत्कालीन कलेक्टर ने कराया था सील
इस मामले का एक पुराना कनेक्शन भी सामने आया है. बताया जाता है कि वर्ष 2019 में तत्कालीन कलेक्टर श्याम धावड़े को मिली शिकायत के बाद क्लिनिक पर कार्रवाई की गई थी. उस समय कलेक्टर की मौजूदगी में क्लिनिक को सील कराया गया था.
बताया जा रहा है कि उस समय क्लिनिक उरमाल की मुख्य बस्ती में संचालित होता था. कार्रवाई के करीब डेढ़ साल बाद इसे कथित तौर पर कश्यपपारा में दोबारा शुरु कर दिया गया.
ओडिशा से भी आते हैं मरीज
क्लिनिक संचालक को स्थानीय स्तर पर 'उड़िया डॉक्टर' के नाम से भी जाना जाता है. दावा है कि ओडिशा के आसपास के इलाकों से भी मरीज यहां उपचार कराने पहुंचते हैं. खासकर हड्डी और जोड़ संबंधी दर्द के इलाज के लिए यहां आने वाले मरीजों की तादाद ज्यादा बताई जा रही है.
हालांकि, अब तक इस इलाज को लेकर प्रशासन के पास कोई लिखित शिकायत नहीं पहुंचने की बात सामने आई है. ऐसे में स्वास्थ्य विभाग द्वारा क्लिनिक की योग्यता, पंजीयन, अनुमति, दवाओं और इलाज की वैधता की जांच किए जाने के बाद ही स्थिति साफ हो सकेगी.
अब स्वास्थ्य विभाग की जांच का इंतजार
इस मामले को लेकर बीएमओ मैनपुर गजेंद्र ध्रुव ने कहा कि उन्हें अब तक इस बारे में कोई शिकायत नहीं मिली है. उन्होंने मामले को दिखवाने की बात कही है. उन्होंने कहा कि अगर क्लिनिक का संचालन अवैध पाया जाता है तो नियमानुसार कार्रवाई की जाएगी.
अब सवाल यह है कि अगर बिना आवश्यक अनुमति या मानकों के क्लिनिक का संचालन हो रहा है तो इतने सालों से स्वास्थ्य विभाग की निगरानी से यह कैसे बचा रहा? मरीजों को किस आधार पर इंजेक्शन और दवाएं दी जा रही हैं और संचालक के पास इलाज से संबंधित कौन-कौन से वैध दस्तावेज हैं. इन सवालों का जवाब विभागीय जांच के बाद ही सामने आएगा.
10 दिन में दो मौतों ने बढ़ाई चिंता, अमलीपदर इलाके में 5 सितंबर
को सराईपानी निवासी 54 वर्षीय डिगने यादव की मौत हुई थी। इसके बाद परिजनों का एक वीडियो सामने आया था, जिसमें निजी स्तर पर उपचार के बाद मौत होने का दावा किया गया था. मामले की जानकारी मिलने पर जिला स्तर से जांच टीम पहुंची. हालांकि जांच के दौरान आरोप लगाने वाले परिजन अपने पूर्व के आरोप से पीछे हट गए.
इसके करीब 10 दिन बाद 15 सितंबर को सरनाबहाल के कुरलापारा निवासी 55 साल के अभिलाष नेताम की मौत हो गई. इस मामले में भी निजी स्तर पर इलाज कराए जाने की जानकारी सामने आई है. हालांकि परिजनों की तरफ से अब तक दवा या इलाज को लेकर कोई शिकायत दर्ज नहीं कराई गई है. स्वास्थ्य विभाग ने मामले की जांच कराने की बात कही है.
तेज सांस की शिकायत, पीएचसी से किया गया रेफर
जानकारी के मुताबिक अभिलाष नेताम की तबीयत बिगड़ने पर परिजन उसे उरमाल प्राथमिक स्वास्थ्य केंद्र लेकर पहुंचे थे. वहां चिकित्सक सनत कुम्भकार ने मरीज की जांच की. चिकित्सक के मुताबिक मरीज की सांस तेज चल रही थी. मलेरिया और शुगर की जांच कराई गई. जिसकी रिपोर्ट निगेटिव बताई गई.
चिकित्सक के मुताबिक पूछताछ के दौरान परिजनों ने निजी स्तर पर मलेरिया का इलाज और इंजेक्शन लगाए जाने की जानकारी दी थी. रेफरल लेटर में भी मलेरिया का उल्लेख होने की बात सामने आई है.
इसके बाद परिजन मरीज को ओडिशा के धर्मगढ़ स्थित निजी क्लिनिक ले गए. वहां इलाज नहीं मिलने पर उसे सरकारी अस्पताल ले जाया गया. परिजनों के मुताबिक रात भर इलाज के बाद स्थिति सामान्य हुई और वे मरीज को घर लेकर लौटे. लेकिन अगले दिन अभिलाष नेताम की मौत हो गई.
मौत किस वजह से हुई और पूर्व में कराए गए इलाज की इसमें कोई भूमिका थी या नहीं, यह जांच के बाद ही स्पष्ट हो सकेगा.
मेडिकल स्टोर के वीडियो ने खोली निगरानी की पोल?
इसी बीच सरनाबहाल में संचालित एक मेडिकल स्टोर का वीडियो सामने आया, जिसमें एक अनधिकृत व्यक्ति द्वारा दवा देने और इंजेक्शन लगाने जैसी गतिविधि दिखाई देने का दावा किया गया. मामले में औषधि विभाग ने कार्रवाई करते हुए संबंधित मेडिकल स्टोर को सील कर दिया.
इस कार्रवाई के बाद सवाल उठना स्वाभाविक है कि यदि किसी मेडिकल स्टोर में चिकित्सकीय उपचार अथवा इंजेक्शन लगाने जैसी गतिविधियां हो रही थीं. तो इसकी जानकारी संबंधित विभागीय निगरानी तंत्र तक पहले क्यों नहीं पहुंची?
अब शोभा से सामने आया ‘गांव-गांव इलाज’ का दावा
इसी कड़ी में मैनपुर विकासखंड के ग्राम शोभा से भी कथित झोलाछाप प्रैक्टिस का मामला सामने आने का दावा किया जा रहा है. स्थानीय स्तर पर लगाए जा रहे आरोपों के मुताबिक एक व्यक्ति लंबे समय से गांव-गांव जाकर दवाइयां देने और इंजेक्शन लगाने जैसी गतिविधियां कर रहा है.
बताया जा रहा है कि संबंधित व्यक्ति मरीजों के घर या गांवों तक मोटरसाइकिल से दवाइयों का बैग लेकर पहुंचता है. हालांकि उसके पास कौन-सी चिकित्सकीय योग्यता है. इलाज करने की वैध अनुमति है या नहीं और वह किन परिस्थितियों में मरीजों का इलाज करता है. इन तथ्यों की आधिकारिक पुष्टि जांच के बाद ही हो सकती है.
कुछ सालों में बढ़ी संपत्ति की भी चर्चा
शोभा क्षेत्र में स्थानीय स्तर पर यह दावा भी किया जा रहा है कि संबंधित व्यक्ति ने कथित चिकित्सा गतिविधियों के जरिए मैनपुर और शोभा क्षेत्र में बड़ी संपत्ति अर्जित की है. कुछ लोगों द्वारा करोड़ों रुपये की संपत्ति खड़ी किए जाने की चर्चा भी की जा रही है.
हालांकि संपत्ति की वास्तविक कीमत, उसके स्वामित्व, आय के स्रोत और कथित चिकित्सा गतिविधियों के बीच संबंध की स्वतंत्र पुष्टि नहीं हुई है. इसलिए इस दावे को फिलहाल आरोप और स्थानीय चर्चा के रुप में ही देखा जाना चाहिए.
यदि जांच में बिना आवश्यक चिकित्सकीय योग्यता के इलाज किए जाने की पुष्टि होती है. तो चिकित्सा गतिविधियों के साथ-साथ संबंधित आय और संपत्ति के स्रोत की जांच की मांग भी उठ सकती है.
70 से ज्यादा गांव, डेढ़ लाख आबादी और डॉक्टरों की कमी
अमलीपदर सामुदायिक स्वास्थ्य केंद्र के अंतर्गत 70 से ज्यादा गांव और करीब डेढ़ लाख की आबादी आने की जानकारी सामने आई है. दूरस्थ और वनांचल क्षेत्रों में चिकित्सकों और स्वास्थ्यकर्मियों की उपलब्धता एक चुनौती बनी हुई है. ऐसे में समय पर सरकारी स्वास्थ्य सुविधा नहीं मिलने पर ग्रामीण निजी उपचार की तरफ रुख करते हैं.
यही परिस्थितियां अगर अनधिकृत चिकित्सा गतिविधियों को बढ़ावा देती हैं. तो इसका सीधा असर ग्रामीण मरीजों की सुरक्षा पर पड़ सकता है.
विभाग का पक्ष—जांच के बाद ही साफ होगी तस्वीर
गरियाबंद के सीएमएचओ वी.के. नवरत्न ने सरनाबहाल में ग्रामीण की मौत की जानकारी की पुष्टि करते हुए कहा है कि मामले की जांच के लिए टीम बनाई जा रही है और सभी मामलों की जांच कराई जा रही है. उन्होंने बताया कि अमलीपदर में दो डॉक्टरों की पोस्टिंग की गई है और अन्य रिक्त पदों को भरने की प्रक्रिया भी चल रही है. स्वास्थ्य विभाग का कहना है कि जांच पूरी होने के बाद ही मौत की असल वजह और इलाज से जुड़े तथ्यों की स्थिति स्पष्ट हो सकेगी.
अब सवाल कार्रवाई से आगे, निगरानी व्यवस्था पर
गरियाबंद, मैनपुर, छुरा, देवभोग, फिंगेश्वर और राजिम सहित जिले के ग्रामीण क्षेत्रों में समय-समय पर कथित अनधिकृत इलाज की शिकायतें सामने आती रही हैं. ऐसे में अब सवाल सिर्फ किसी एक व्यक्ति या एक मेडिकल स्टोर की कार्रवाई का नहीं, बल्कि पूरे जिले में निजी चिकित्सा गतिविधियों की निगरानी व्यवस्था का है.
कितने निजी क्लीनिक और प्रैक्टिशनर वैध रूप से पंजीकृत हैं?
बिना आवश्यक योग्यता के इलाज करने वालों की नियमित जांच कितनी होती है?
मेडिकल स्टोरों में दवा बिक्री की आड़ में उपचार अथवा इंजेक्शन लगाने की गतिविधियों की निगरानी कौन करता है?
और शिकायत मिलने के बाद कार्रवाई के साथ यह भी सुनिश्चित किया जाता है या नहीं कि वही गतिविधि दोबारा शुरु न हो?
अमलीपदर की दो मौतों, सरनाबहाल के मेडिकल स्टोर पर हुई कार्रवाई और शोभा से सामने आए कथित गांव-गांव इलाज के आरोपों ने इन सवालों को और गंभीर बना दिया है. अब जांच और विभागीय कार्रवाई से ही स्पष्ट होगा कि इन मामलों में आरोपों की वास्तविकता क्या है और जिले में अनधिकृत चिकित्सा गतिविधियों पर रोक लगाने के लिए व्यवस्था कितनी प्रभावी है.
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