ऑनलाइन पेमेंट के बदले नकद देने का खेल, 45 च्वाइस सेंटर संचालकों से 25 लाख की धोखाधड़ी, QR कोड बना ठगी का हथियार, रायपुर के दो आरोपी गिरफ्तार

Cash-for-online-payment racket: 45 Choice Center operators defrauded of ₹25 lakh; QR codes used as a tool for fraud; two accused from Raipur arrested.

ऑनलाइन पेमेंट के बदले नकद देने का खेल, 45 च्वाइस सेंटर संचालकों से 25 लाख की धोखाधड़ी, QR कोड बना ठगी का हथियार, रायपुर के दो आरोपी गिरफ्तार

बिलासपुर : डिजिटल भुगतान की सुविधा को साइबर ठगी का हथियार बनाकर च्वाइस सेंटर संचालकों को निशाना बनाने वाले दो आरोपियों के कथित नेटवर्क का बिलासपुर रेंज साइबर पुलिस ने पर्दाफाश किया है. आरोपियों पर फोन-पे के लेन-देन के नाम पर सेंटर संचालकों का भरोसा जीतकर उनके QR कोड का दुरुपयोग करने और बदले में नकदी लेकर फरार होने का आरोप है. इस तरीके से बिलासपुर समेत छत्तीसगढ़ के नौ जिलों में करीब 45 च्वाइस सेंटर संचालकों को शिकार बनाया गया. धोखाधड़ी की अनुमानित रकम 20 से 25 लाख रुपये बताई जा रही है.
मामले में पुलिस ने रायपुर निवासी अंकित आहूजा और आशीष केवटवानी को गिरफ्तार किया है. आरोपियों के कब्जे और घटना में इस्तेमाल से संबंधित कुल 1 लाख 2 हजार रुपये नकद, एक बोलेनो कार, एक स्कूटी और दो मोबाइल फोन जब्त किए गए हैं. थाना रेंज साइबर बिलासपुर में अपराध क्रमांक 05/2026 के तहत धारा 318(4), 317(4) और 3(5) भारतीय न्याय संहिता (बीएनएस) में मामला दर्ज कर जांच की जा रही है.
मामले की शुरुआत बिल्हा मोड़ स्थित लक्ष्मी च्वाइस सेंटर के संचालक देवेंद्र रजक की शिकायत से हुई. प्रार्थी ने बताया कि 5 अक्टूबर 2026 को दोपहर करीब 12:38 बजे एक व्यक्ति बोलेनो कार से उसके सेंटर पहुंचा. उसने फोन-पे के जरिए होने वाले लेन-देन का हवाला देते हुए कहा कि वह ऑनलाइन भुगतान के बदले नकद रकम देना चाहता है.
संचालक ने उसकी बात पर भरोसा कर सहमति दे दी. इसके बाद आरोपी ने सेंटर के QR कोड का फोटो अपने मोबाइल में लिया और वहां से चला गया. आरोप है कि इसी QR कोड का इस्तेमाल कर 16 हजार रुपये का लेन-देन किया गया और संचालक को उसके बदले नकद रकम दी गई.
लेकिन इस लेन-देन का असली पेंच अगले दिन सामने आया. देवेंद्र रजक के बैंक खाते पर होल्ड लग गया. जब वह भारतीय स्टेट बैंक की चकरभाठा शाखा पहुंचा और जानकारी ली. तो पता चला कि उसके फोन-पे से जुड़े खाते को साइबर फ्रॉड के मामले में होल्ड किया गया है. यानी जिस लेन-देन को संचालक सामान्य डिजिटल भुगतान समझ रहा था. वही उसके लिए बैंक खाते की परेशानी की वजह बन गया.
इसके बाद च्वाइस सेंटर संचालकों के व्हाट्सएप ग्रुप से उसे जानकारी मिली कि इसी तरह अन्य संचालकों के साथ भी धोखाधड़ी की गई है. शिकायत के आधार पर पुलिस ने मामला दर्ज कर जांच शुरू की.
पुलिस की जांच में कथित ठगी का तरीका सामने आया. अंकित आहूजा अपने साथी आशीष केवटवानी के कहने पर अलग-अलग च्वाइस सेंटर और कॉमन सर्विस सेंटर (CSC) में पहुंचता था. वह संचालकों से ऑनलाइन भुगतान के बदले नकद रकम देने की बात करता और उनके QR कोड का फोटो अपने मोबाइल से लेता था.
इसके बाद वह QR कोड अपने साथी आशीष को भेज देता था. आशीष उस QR कोड का इस्तेमाल कर संबंधित लेन-देन करता था. जबकि अंकित सेंटर संचालक से नकदी लेकर निकल जाता था. बाद में जब संबंधित बैंक खातों पर साइबर फ्रॉड की शिकायतों की वजह से होल्ड लगने लगा. तब संचालकों को पूरे मामले की गंभीरता समझ आई.
इस तरीके में संचालकों को तत्काल नकदी मिल जाने से लेन-देन सामान्य दिखाई देता था. लेकिन बाद में उनके खातों में संदिग्ध रकम आने या उससे जुड़े साइबर अपराध की शिकायत सामने आने पर वे बैंकिंग संबंधी परेशानी में फंस जाते थे.
आरोपियों की गतिविधियां सिर्फ बिलासपुर जिले तक सीमित नहीं थीं. जांच में बिलासपुर के अलावा रायपुर, महासमुंद, बलौदाबाजार, कोरबा, जांजगीर-चांपा, रायगढ़, सक्ती और दुर्ग जिले के च्वाइस सेंटर संचालकों के साथ धोखाधड़ी की जानकारी सामने आई है.
अब तक करीब 45 पीड़ितों के आवेदन प्राप्त होने की बात कही गई है. इन शिकायतों के आधार पर धोखाधड़ी की कुल अनुमानित रकम 20 से 25 लाख रुपये आंकी गई है. पुलिस मामले की जांच कर रही है. जिससे अन्य पीड़ितों, लेन-देन और संभावित कड़ियों की जानकारी सामने आ सके.
मामले की गंभीरता को देखते हुए वरिष्ठ अधिकारियों के निर्देश पर पुलिस टीम गठित की गई. पुलिस को आशंका थी कि आरोपी बिलासपुर क्षेत्र में फिर सक्रिय हो सकते हैं. इसी दौरान रेंज साइबर पुलिस को खबर मिली कि अंकित आहूजा हिर्री और बिल्हा क्षेत्र में दोबारा वारदात करने की कोशिश में घूम रहा है.
पुलिस ने उसे हिरासत में लेकर पूछताछ की. पूछताछ में अंकित ने अपने साथी आशीष केवटवानी के साथ मिलकर वारदातों को अंजाम देना कबूल किया. इसके बाद दूसरे आरोपी की भूमिका सामने आने पर कार्रवाई की गई और दोनों को गिरफ्तार किया गया.
पुलिस ने आरोपियों से संबंधित 1 लाख 2 हजार रुपये नकद, वारदात में इस्तेमाल की गई एक बोलेनो कार, एक स्कूटी और दो मोबाइल फोन जब्त किए हैं. जब्त मोबाइल फोन की जांच और बैंकिंग लेन-देन की पड़ताल से मामले में अन्य अहम जानकारियां सामने आने की संभावना है.
यह मामला डिजिटल भुगतान के दौरान सतर्कता की जरूरत को रेखांकित करता है. च्वाइस सेंटर संचालकों के लिए जरूरी है कि वे अनजान व्यक्तियों के साथ संदिग्ध लेन-देन करने से बचें. भुगतान की वास्तविक स्थिति की पुष्टि करें और किसी भी असामान्य ट्रांजेक्शन की जानकारी मिलने पर तत्काल बैंक तथा साइबर पुलिस से संपर्क करें.
खाते पर अचानक होल्ड लगना, अनजान लेन-देन का रिकॉर्ड दिखाई देना या किसी भुगतान को लेकर बैंक से शिकायत मिलना गंभीर संकेत हो सकते हैं. ऐसे मामलों में संबंधित ट्रांजेक्शन का रिकॉर्ड, बैंक विवरण, मोबाइल संदेश और उपलब्ध सीसीटीवी फुटेज सुरक्षित रखना जांच में मददगार हो सकता है.
इस कार्रवाई में पुलिस महानिरीक्षक रामगोपाल गर्ग, वरिष्ठ पुलिस अधीक्षक रजनेश सिंह और संबंधित नोडल अधिकारी के निर्देशों के तहत टीम ने काम किया. अतिरिक्त पुलिस अधीक्षक शहर प्रकाश पाटले और उप पुलिस अधीक्षक रेंज साइबर संदीप सरकार के मार्गदर्शन में कार्रवाई की गई.
फिलहाल पुलिस के सामने अब इस कथित नेटवर्क से जुड़े सभी लेन-देन की कड़ियां जोड़ने, बाकी पीड़ितों की पहचान करने और धोखाधड़ी की वास्तविक रकम का पता लगाने की चुनौती है. करीब 45 संचालकों से जुड़ा यह मामला बताता है कि डिजिटल भुगतान के नाम पर भरोसे का फायदा उठाकर किस तरह छोटे कारोबारियों को बड़ी आर्थिक और बैंकिंग परेशानी में डाला जा सकता है.
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