बुनकरों का छलक रहा दर्द: 8 घंटे की कड़ी मेहनत, मिल रहा उचित दाम, हाथ में 200 रुपये भी नहीं, देवभोग से पलायन की दर्दनाक कहानी
The weavers' enduring plight: 8 hours of grueling labor, fair pricing, yet not even 200 rupees in hand—a painful tale of migration from Devbhog.
गरियाबंद/देवभोग : हाथकरघा पर 6 से 8 घंटे तक लगातार मेहनत करने के बावजूद बुनकरों को 200 रुपये प्रतिदिन का मेहनताना भी नहीं मिल पा रहा है और महंगाई के दौर में परिवार का भरण-पोषण करना भी मुश्किल होता है. ऐसे में कई बुनकर अपने पारंपरिक व्यवसाय को छोड़कर दूसरे राज्यों में मजदूरी करने के लिए पलायन करने को मजबूर हैं. हालांकि मुख्यमंत्री विष्णुदेव साय की सरकार द्वारा बुनाई के मेहनताने में 20% की वृद्धि कर थोड़ी राहत पहुंचाई है. जानकारी मुताबिक पूर्व सरकार में निर्धारित दरों के मुताबिक मोटे धागे की बुनाई पर बुनकरों को प्रति मीटर 26 रुपये 40 पैसे मेहनताना मिलता था. जिसे मुख्यमंत्री विष्णुदेव साय सरकार ने साल भर पहले इसमें 20% की वृद्धि करते हुए दर को 33 रुपये 36 पैसे प्रति मीटर कर दिया. इसी तरह पतले धागे की बुनाई का मेहनताना भी प्रति मीटर 30 रुपये 32 पैसे से बढ़ाकर 37 रुपये 90 पैसे कर दिया गया है. लेकिन पूरे 6 से 8 घंटा कड़ी परिश्रम के बाद भी रोजमर्रा की जरूरतों को पूरा करना चुनौती बन गया है. इसलिए देवभोग क्षेत्र के धौरकोट, कुमडाई कला, सागौनभाड़ी, कोसमकानो और खलियाभांटा सहित अन्य सोसायटी से कई बुनकर दूसरे राज्यों में रोजगार की तलाश करने निकल रहे हैं. तभी बुनकरों से गुलजार सोसायटी में गिनती के उम्रदराज लोग दिखाई पड़ते है. और इसके मद्देनजर मुंगझर बुनकर सोसायटी के बुनकरों का कहना है कि बुनकरी पारंपरिक व्यवसाय है. इसमें लगने वाले परिश्रम को देखते हुए मेहनताने में वृद्धि तो बहुत पहले हुई जो महत्वपूर्ण कदम भी है. लेकिन वर्तमान दौर को देखते बुनकरी में और अधिक राशि बढ़ाने की दरकार बताई है.
45 साल पुराने जर्जर भवन में बुनकर सोसायटी संचालित
इलाके की मुंगझर बुनकर सोसायटी की स्थिति चिंताजनक बनी हुई है. विडंबना यह है कि सोसायटी का संचालन करीब 45 साल पुराने भवन में आज भी किया जा रहा है. जबकि भवन की हालत काफी खराब हो चुकी है. भवन की खिड़कियां टूट चुकी हैं. दीवारों पर जगह-जगह दरारें दिखाई दे रही हैं और फर्श भी उखड़ने लगा है. इसके बावजूद सोसायटी का कामकाज इसी जर्जर भवन से संचालित हो रहा है. भवन की मौजूदा स्थिति को देखते हुए यहां काम करने वाले लोगों और आने-जाने वाले हितग्राहियों की सुरक्षा को लेकर सवाल उठने लगे हैं. लंबे समय से उपयोग में आ रहे इस भवन की मरम्मत या नए भवन की व्यवस्था की जरुरत महसूस की जा रही है. फिर भी जिम्मेदार जनप्रतिनिधि और संबंधित विभाग कोई सुध नहीं ले रहे है. ऐसे में अप्रिय घटना की आशंका भी जताई जाती है. क्योंकि अभी ठीक तरह से मरम्मत भी नही हो पाया हैं.
2018 के बाद से नहीं हुए चुनाव, 8 बुनकर सोसायटियों में अध्यक्ष पद खाली होने से भागीदारी प्रभावित
बताया जाता है कि वर्ष 2017-18 में बुनकर सोसायटियों के चुनाव हुए थे. लेकिन इसके बाद से अब तक चुनाव नहीं हो पाए हैं. हालत यह है कि सिर्फ धौरकोट सोसायटी में ही अध्यक्ष कार्यरत हैं. जबकि बाकी आठ सोसायटियों में चुनाव नहीं होने की वजह से अध्यक्ष पदों पर व्यवस्था प्रभावित बनी हुई है. चुनाव नहीं होने से बुनकरों को अपनी समस्याओं और मांगों को शासन-प्रशासन तक पहुंचाने में कठिनाइयों का सामना करना पड़ रहा है. बुनकर समुदाय के लोगों का कहना है कि सोसायटियों में समय पर चुनाव होना जरूरी है. ताकि उनके प्रतिनिधि लोकतांत्रिक तरीके से चुने जा सकें और समाज की समस्याओं को संबंधित अधिकारियों के सामने प्रभावी ढंग से रखा जा सके. लंबे समय से चुनाव नहीं होने की वजह से बुनकर अपनी भागीदारी से वंचित महसूस कर रहे हैं. ऐसे में संबंधित विभाग और प्रशासन से सोसायटियों में जल्द चुनाव कराने की मांग भी बुनकर लोग लंबे समय से कर रहे हैं. ताकि बुनकरों को प्रतिनिधित्व मिल सके और उनकी समस्याओं का समाधान हो सके.
अश्वथनाथ सिंग प्राधिकृत अधिकारी सीनापाली-: उप विधि के संशोधन के लिए भेजा गया मतलब चुनाव प्रक्रियाधीन हैं.
झझकेतन सोनवानी प्राधिकृत अधिकारी मुंगझर-: बुनकरों की दर शासन की ओर से निर्धारित होती हैं जैसे बढ़ता है उसके अनुरूप राशि मिलती है.



