33 साल पहले मृत महिला को बताया जीवित, 15 एकड़ जमीन की रजिस्ट्री का आरोप, किसान ने लगाई इंसाफ की गुहार, व्यवस्था पर उठे सवाल

Woman declared alive 33 years after her death; allegations of 15-acre land deed registration; farmer pleads for justice; questions raised about the system.

33 साल पहले मृत महिला को बताया जीवित, 15 एकड़ जमीन की रजिस्ट्री का आरोप, किसान ने लगाई इंसाफ की गुहार, व्यवस्था पर उठे सवाल

गौरेला-पेंड्रा-मरवाही : गौरेला जिले में कथित भू-माफियाओं के एक बड़े फर्जीवाड़े का मामला सामने आया है. जिसने राजस्व और पंजीयन विभाग की कार्यप्रणाली पर गंभीर सवाल खड़े कर दिए हैं. आरोप है कि वर्ष 1992 में मृत हो चुकी एक आदिवासी महिला को दस्तावेजों में जीवित दर्शाकर उसकी करीब 15 एकड़ कृषि भूमि की रजिस्ट्री 19 मई 2026 को रायपुर की सफायर बायो एनर्जी और मलका पावर प्राइवेट लिमिटेड के पक्ष में कर दी गई. मामले का खुलासा होने के बाद पीड़ित आदिवासी परिवार इंसाफ की गुहार लगा रहा है और पूरे मामले की निष्पक्ष जांच की मांग कर रहा है.
मिली जानकारी के मुताबिक गौरेला विकासखंड के ग्राम नेवरी नवापारा, पटवारी हल्का नम्बर 23 स्थित जमीन मूल रूप से आदिवासी महिला नरबदिया बाई के नाम दर्ज थी. परिजनों का कहना है कि नरबदिया बाई की मौत वर्ष 1992 में हो चुकी है. इसके बावजूद उनके नाम से जमीन की बिक्री कर दी गई. परिवार का आरोप है कि जिस महिला को दस्तावेजों में नरबदिया बाई बताया गया है. वह न सिर्फ दूसरी महिला है. बल्कि उसकी उम्र भी दस्तावेजों में 60 साल दर्ज है, जबकि वर्ष 1954-55 के अधिकार अभिलेख के आधार पर वास्तविक नरबदिया बाई की वर्तमान उम्र करीब 91 साल होनी चाहिए थी. इतना ही नहीं, मृत महिला गोंड आदिवासी समाज से थी. जबकि रजिस्ट्री में पेश महिला को यादव समाज का बताया गया है.
मृतका के बड़े बेटे रामअवतार आर्मो ने बताया कि उनकी मां की मौत 33 साल पहले हो चुकी है. जब उन्हें पता चला कि उनकी मृत मां के नाम से जमीन की रजिस्ट्री हो गई है तो पूरा परिवार स्तब्ध रह गया.
उन्होंने आरोप लगाया कि फर्जी दस्तावेज तैयार कर आदिवासी परिवार की जमीन हड़पने की साजिश रची गई है. पीड़ित परिवार का कहना है कि रजिस्ट्री में उपयोग किए गए दस्तावेजों में कई गंभीर खामियां हैं. अधिकार अभिलेख में दर्ज उम्र का मिलान नहीं किया गया. आवश्यक दस्तावेज प्रमाणित नहीं थे और जमीन की चौहद्दी में भी अंतर पाया गया. मामले में जब संबंधित हल्का पटवारी रोहित भगत से पूछताछ की गई तो उन्होंने दस्तावेजों पर लगे दस्तखत, सील और पदमुद्रा को अपना मानने से इंकार करते हुए कहा कि संबंधित चौहद्दी उन्होंने जारी नहीं की है.
वहीं उप पंजीयक आशुतोष अग्रवाल का कहना है कि पंजीयन कार्यालय में पेश दस्तावेजों के आधार पर ही रजिस्ट्री की गई. उन्होंने कहा कि अगर दस्तावेज फर्जी हैं तो संबंधित पक्ष अदालत में चुनौती देकर कार्रवाई करा सकता है. रजिस्ट्री में दो गवाहों के नाम भी सामने आए हैं. जो न तो संबंधित गांव के निवासी हैं और न ही जमीन वाले क्षेत्र से जुड़े हुए बताए जा रहे हैं. इससे पूरे मामले में भू-माफियाओं, दस्तावेज तैयार करने वालों और संबंधित अधिकारियों की भूमिका पर भी सवाल उठ रहे हैं.
फिलहाल पीड़ित आदिवासी परिवार ने प्रशासन से फर्जी रजिस्ट्री निरस्त कर जमीन वापस दिलाने तथा पूरे मामले की उच्चस्तरीय जांच कर दोषियों के खिलाफ सख्त कार्रवाई की मांग किया है. अगर आरोप सही साबित होते हैं तो यह मामला प्रदेश के सबसे बड़े जमीन फर्जीवाड़ों में से एक माना जा सकता है.
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