हॉस्पिटल में 19 घंटे इलाज के बाद मौत, पौने 5 लाख का बिल, परिजनों को लगा दूसरा झटका, बार्गेनिंग के बाद 2.25 लाख में मामला डन, बिलिंग पर उठे सवाल

Death after 19 hours of hospital treatment; bill of ₹4.75 lakh. Family suffers a second shock; deal settled at ₹2.25 lakh after bargaining; questions raised regarding the billing.

हॉस्पिटल में 19 घंटे इलाज के बाद मौत, पौने 5 लाख का बिल, परिजनों को लगा दूसरा झटका, बार्गेनिंग के बाद 2.25 लाख में मामला डन, बिलिंग पर उठे सवाल

बिलासपुर : बिलासपुर शहर के एक प्राइवेट अस्पताल में इलाज के दौरान हार्ट अटैक से मरीज की मौत के बाद परिजनों को कथित तौर पर करीब पौने 5 लाख रुपये का बिल थमाए जाने का मामला सामने आया है. परिजनों के मुताबिक मरीज अस्पताल में करीब 19 घंटे रहा और इलाज के दौरान उसकी मौत हो गई. मौत के सदमे से जूझ रहे परिवार के सामने जब अस्पताल का भारी-भरकम बिल आया तो उनके होश उड़ गए. परिजनों और परिचितों द्वारा अस्पताल प्रबंधन से बातचीत और कथित तौर पर बार्गेनिंग के बाद करीब 2 लाख 25 हजार रुपये में भुगतान कर शव सौंपे जाने की बात सामने आई है. मामले ने शहर में प्राइवेट अस्पतालों की बिलिंग व्यवस्था, इलाज की लागत और मरीजों के परिजनों की मजबूरी को लेकर एक बार फिर सवाल खड़े कर दिए हैं.
मिली जानकारी के मुताबिक मरीज को सीने में दर्द की शिकायत हुई थी. मंगलवार दोपहर करीब 3 बजे मरीज अपने बेटे के साथ ऑटो से ELITE MEDCITY हॉस्पिटल पहुंचा. परिजनों के मुताबिक अस्पताल में मरीज का इलाज शुरू किया गया. करीब 19 घंटे बाद बुधवार सुबह 9 से 10 बजे के बीच मरीज की मौत हो गई. परिवार के मुखिया की मौत का दुख अभी कम भी नहीं हुआ था कि अस्पताल की तरफ से कथित तौर पर करीब पौने 5 लाख रुपये का बिल सामने रख दिया गया. अचानक सामने आए इस बिल को देखकर परिजन और उनके परिचित हैरान रह गए.
19 घंटे में पौने 5 लाख कैसे..?
परिजनों का सवाल था कि जब मरीज अस्पताल में करीब 19 घंटे ही रहा तो इतनी बड़ी रकम किस मद में खर्च हुई? परिजनों के मुताबिक उन्होंने अस्पताल प्रबंधन से बिल को लेकर बातचीत की. परिचितों के जरिए भी अस्पताल प्रबंधन से संपर्क किया गया. इसके बाद कथित तौर पर बिल की रकम घटाकर 2 लाख 25 हजार रुपये के आसपास कर दी गई. यानी शुरुआती तौर पर बताए गए करीब पौने 5 लाख रुपये के मुकाबले अंतिम भुगतान की रकम आधे से भी कम रही. यही अंतर अब पूरे मामले का सबसे बड़ा सवाल बन गया है.
हालांकि अस्पताल की तरफ से बिल की वास्तविक मदों, डिस्काउंट और अंतिम भुगतान को लेकर आधिकारिक स्पष्टीकरण सामने आना बाकी है. ऐसे में पूरे मामले की निष्पक्ष जांच के बाद ही यह साफ हो सकेगा कि बिल में किन-किन सेवाओं और उपचार मदों को शामिल किया गया था.
मौत के बाद बिलिंग का झटका क्यों…?
मरीज की मौत किसी भी परिवार के लिए सबसे बड़ा सदमा होती है. ऐसे समय में जब परिजन शव को घर ले जाने की तैयारी कर रहे हों और उनके सामने इलाज के नाम पर लाखों रुपये का बिल रख दिया जाए. तो उनकी परेशानी और बढ़ जाती है. इस मामले में सबसे बड़ा सवाल यही है कि 19 घंटे के इलाज का शुरुआती बिल करीब पौने 5 लाख रुपये क्यों बना और बातचीत के बाद यह रकम करीब 2.25 लाख रुपये तक कैसे आ गई? अगर बिलिंग में अनियमितता हुई है तो स्वास्थ्य विभाग को इसकी जांच कर कार्रवाई करनी चाहिए.
शहर में बढ़ते निजी अस्पताल, बढ़ती शिकायतें
कोरोनाकाल के बाद बिलासपुर शहर और आसपास के इलाकों में प्राइवेट अस्पतालों और मेडिकल स्टोर्स की संख्या में तेजी से इजाफा हुआ है. आधुनिक सुविधाओं और बेहतर इलाज के दावों के बीच मरीजों को राहत मिलने की उम्मीद रहती है. लेकिन समय-समय पर प्राइवेट अस्पतालों पर लापरवाही, इलाज में कोताही, अनाप-शनाप बिलिंग और मरीजों के परिजनों से मनमानी वसूली जैसे आरोप सामने आते रहे हैं. हालांकि हर शिकायत को अस्पताल की गलती मान लेना भी उचित नहीं होगा. लेकिन शिकायतों की संख्या को देखते हुए स्वास्थ्य विभाग की जिम्मेदारी बढ़ जाती है कि वह अस्पतालों की बिलिंग, उपचार व्यवस्था और सरकारी स्वास्थ्य योजनाओं के क्रियान्वयन की नियमित निगरानी करे.
योजनाएं बहुत, फिर मरीज निजी अस्पतालों में क्यों परेशान…?
छत्तीसगढ़ में गरीब और जरूरतमंद मरीजों को बेहतर चिकित्सा सुविधा उपलब्ध कराने के लिए  सरकार की ओर से कई योजनाएं संचालित की जा रही हैं. आयुष्मान भारत योजना, शहीद वीर नारायण सिंह आयुष्मान स्वास्थ्य योजना, मुख्यमंत्री विशेष स्वास्थ्य सहायता योजना जैसी योजनाओं के जरिए गंभीर बीमारियों के इलाज में आर्थिक सहायता और कैशलेस उपचार की व्यवस्था का दावा किया जाता है. मुख्यमंत्री विशेष स्वास्थ्य सहायता योजना के तहत गंभीर बीमारियों के इलाज के लिए अधिकतम 25 लाख रुपये तक की आर्थिक सहायता दिए जाने का प्रावधान बताया जाता है. इसके अलावा आयुष्मान योजना के तहत पात्र मरीजों को सूचीबद्ध अस्पतालों में निर्धारित उपचार उपलब्ध कराने की व्यवस्था है. सरकार की ओर से अस्पतालों में अनियमितता पाए जाने पर कार्रवाई का दावा भी किया जाता है. ऐसे में सवाल यह है कि अगर सरकारी योजनाएं मौजूद हैं. तो पात्र मरीजों को प्राइवेट अस्पतालों में इलाज और बिलिंग के स्तर पर इस तरह की परेशानियों का सामना क्यों करना पड़ रहा है?
कोरोनाकाल की भारी-भरकम बिलिंग की यादें आज भी ताजा
कोरोनाकाल के दौरान प्राइवेट अस्पतालों में इलाज और बिलिंग को लेकर देशभर में सवाल उठे थे. कई परिवारों ने लाखों रुपये के इलाज का खर्च उठाने की शिकायत की थी. उस दौर में मरीज और उनके परिजन बीमारी, भय और आर्थिक संकट से एक साथ जूझ रहे थे. आज भी प्राइवेट अस्पतालों की बिलिंग को लेकर समय-समय पर शिकायतें सामने आती हैं. ऐसे में स्वास्थ्य विभाग के सामने चुनौती है कि वह सिर्फ शिकायत आने के बाद जांच करने के बजाय प्राइवेट अस्पतालों की बिलिंग व्यवस्था और सरकारी स्वास्थ्य योजनाओं के क्रियान्वयन की नियमित मॉनिटरिंग करे.
स्वास्थ्य विभाग की निगरानी व्यवस्था पर भी सवाल
बिलासपुर जिले में निजी अस्पतालों को लेकर लगातार शिकायतें सामने आने के बावजूद स्वास्थ्य विभाग की निगरानी व्यवस्था पर सवाल उठ रहे हैं. मरीजों के परिजनों द्वारा समय-समय पर अस्पतालों में इलाज, बिलिंग और सुविधाओं को लेकर शिकायतें की जाती रही हैं. शहर के कुछ प्राइवेट अस्पतालों..रामा केयरवेल हॉस्पिटल, श्री राम केयर हॉस्पिटल और नोबल हॉस्पिटल को लेकर भी बीते कुछ समय में मरीजों के परिजनों की तरफ से अलग-अलग तरह के आरोप और शिकायतें सामने आने का दावा किया गया है. हालांकि इन सभी मामलों में संबंधित अस्पतालों का पक्ष और स्वास्थ्य विभाग की जांच रिपोर्ट सामने आना जरूरी है.
एंबुलेंस से लेकर अस्पताल में भर्ती तक उठते रहे सवाल
शहर में प्राइवेट अस्पतालों से जुड़े एंबुलेंस नेटवर्क को लेकर भी समय-समय पर सवाल उठते रहे हैं. आरोप लगाए जाते हैं कि कुछ एंबुलेंस मरीजों को विशेष प्राइवेट अस्पतालों तक पहुंचाने के लिए काम करती हैं. हालांकि इन आरोपों की स्वतंत्र पुष्टि जरूरी है. अगर इस तरह का कोई नेटवर्क सक्रिय है. तो स्वास्थ्य विभाग और प्रशासन को इसकी भी जांच करनी चाहिए. क्योंकि गंभीर हालत में मरीज और उसके परिजन अक्सर फैसला लेने की हालत में नहीं होते. ऐसे समय में उन्हें बेहतर और उचित चिकित्सा विकल्प की जानकारी मिलना बेहद जरूरी है.
अब जांच से ही साफ होगा पूरा सच
इस पूरे मामले में सबसे जरूरी है कि संबंधित स्वास्थ्य विभाग अस्पताल से मूल बिल, उपचार की पूरी डिटेल, दवाइयों का विवरण, जांचों की रिपोर्ट, आईसीयू/अन्य सेवाओं के शुल्क और अंतिम भुगतान की रसीद की जांच करे. साथ ही यह भी स्पष्ट किया जाना चाहिए कि शुरुआती तौर पर बताए गए करीब पौने 5 लाख रुपये के बिल और बाद में करीब 2.25 लाख रुपये में हुए भुगतान के बीच इतना बड़ा अंतर क्यों आया. मरीज की मौत के बाद परिवार को आर्थिक रूप से भी झटका लगा या अस्पताल की तरफ से निर्धारित नियमों के अनुसार ही बिलिंग की गई. इसका फैसला आरोप-प्रत्यारोप से नहीं, बल्कि दस्तावेजों की जांच से होना चाहिए.
फिलहाल यह मामला सिर्फ एक परिवार की परेशानी नहीं, बल्कि शहर में प्राइवेट अस्पतालों की बिलिंग व्यवस्था और स्वास्थ्य विभाग की निगरानी प्रणाली पर गंभीर सवाल खड़ा करता है. अब देखना होगा कि स्वास्थ्य विभाग इस शिकायत को भी सामान्य विवाद मानकर ठंडे बस्ते में डालता है या मामले की निष्पक्ष जांच कर वास्तविकता सामने लाता है.
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