विधायक आवास से पहले किसने पहचान ली नकटी की कीमत?, 2.60 एकड़ जमीन, राजस्व रिकॉर्ड में ओएसडी के परिवार का नाम और कई अनसुलझे सवाल

Who recognized the value of the 'Nakti' land before the MLA's residence came up? 2.60 acres of land, the OSD's family name in revenue records, and several unanswered questions.

विधायक आवास से पहले किसने पहचान ली नकटी की कीमत?, 2.60 एकड़ जमीन, राजस्व रिकॉर्ड में ओएसडी के परिवार का नाम और कई अनसुलझे सवाल

रायपुर : सरकारी परियोजनाएं केवल इमारतें नहीं बनातीं, बल्कि जमीनों की किस्मत भी बदल देती हैं. जिस खेत की कल तक सामान्य कीमत होती है. वही किसी सरकारी परियोजना की घोषणा के बाद करोड़ों का हो जाता है. ऐसे में हर बड़ी परियोजना के साथ एक सवाल भी पैदा होता है क्या सरकार के फैसले की जानकारी सबको एक साथ मिलती है. या उसकी आहट कुछ लोगों तक पहले पहुंच जाती है?
राजधानी रायपुर से लगे नकटी गांव को सरकार ने प्रस्तावित विधायक आवासीय कॉलोनी के लिए चुना है. लेकिन इस सरकारी फैसले के बीच राजस्व दस्तावेज़ अब कई ऐसे सवाल खड़े कर रहे हैं. जिनका जवाब सिर्फ बयान से नहीं, बल्कि पूरी टाइमलाइन सार्वजनिक करके ही दिया जा सकता है.
राजस्व विभाग के उपलब्ध अभिलेखों के मुताबिक ग्राम नकटी, तहसील रायपुर, खाता क्रमांक-00077 में दर्ज 1.0520 हेक्टेयर (करीब 2.60 एकड़) भूमि के रिकॉर्ड में “अलका डेवलपर्स द्वारा अधिकृत शौर्य सिंह सिसोदिया, पिता वी.के. सिसोदिया” का उल्लेख दर्ज है. दस्तावेज़ों के मुताबिक यह जमीन खसरा क्रमांक 656/1, 656/2, 657/1, 657/2, 658, 659/1, 661 और 662 में दर्ज है. स्थानीय बाजार के वर्तमान अनुमान के अनुसार इस जमीन की कीमत करीब 25 करोड़ रुपये आंका जा रहा है.
यहीं से कहानी एक नया मोड़ लेती है. वी.के. सिसोदिया वर्तमान में विधानसभा अध्यक्ष और पूर्व मुख्यमंत्री डॉ. रमन सिंह के ओएसडी हैं. दूसरी तरफ सरकार ने इसी नकटी गांव को विधायकों की नई आवासीय कॉलोनी के लिए चुना है. दोनों तथ्य अलग-अलग दस्तावेज़ों में दर्ज हैं. लेकिन जब इन्हें एक साथ पढ़ा जाता है. तो सबसे बड़ा सवाल टाइमिंग का खड़ा होता है.
सरकार ने नकटी को विधायक आवास परियोजना के लिए आखिर कब चुना? संबंधित जमीन से जुड़ी प्रक्रिया कब शुरू हुई? क्या उस समय तक परियोजना की जानकारी सार्वजनिक हो चुकी थी या सिर्फ सरकारी स्तर तक सीमित थी? अहर योजना सालों पुरानी थी. तो नकटी का चयन पहली बार किस तारीख को और किस स्तर पर हुआ?
राजस्व रिकॉर्ड में वर्ष 2022 और 2025 की अलग-अलग प्रविष्टियां भी दिखाई देती हैं. इससे साफ है कि जमीन से जुड़ी प्रक्रिया चरणबद्ध तरीके से आगे बढ़ी. लेकिन अब तक यह सार्वजनिक नहीं है कि मूल खरीद, अधिकृत प्रतिनिधित्व, नामांतरण और विधायक आवास परियोजना के फैसले की तारीखें आपस में किस क्रम में जुड़ती हैं. यही इस पूरे मामले का सबसे अहम पहलू है दस्तावेज़ों में “अलका डेवलपर्स द्वारा अधिकृत” शब्द भी दर्ज हैं. ऐसे में यह स्पष्ट होना जरुरी है कि यह अधिकृत प्रतिनिधित्व किस कानूनी व्यवस्था के तहत है क्या यह डेवलपमेंट एग्रीमेंट है. पावर ऑफ अटॉर्नी है या कोई अन्य व्यवस्था?
इस बीच पूर्व मुख्यमंत्री डॉ. रमन सिंह ने इस पूरे मामले पर अपनी प्रतिक्रिया देते हुए कहा है कि विधायक आवास कॉलोनी का प्रस्ताव 15-20 साल पुराना है और विस्थापन के अलावा दूसरा कोई विकल्प नहीं था.
लेकिन उनके इस बयान के बाद एक नया सवाल भी सामने आ खड़ा हुआ है. अगर यह परियोजना हकीकत में 15-20 साल पुरानी है. तो उस अवधि का ज्यादातर हिस्सा खुद डॉ. रमन सिंह के मुख्यमंत्री कार्यकाल का था. ऐसे में सरकार और संबंधित विभाग के लिए यह बताना और भी जरूरी हो जाता है कि इस परियोजना की फाइल पहली बार कब बनी. नकटी का नाम पहली बार कब प्रस्तावित हुआ,.प्रशासनिक स्तर पर क्या-क्या फैसले हुए और यह पूरी प्रक्रिया किस टाइमलाइन में आगे बढ़ी. यानी अब बहस सिर्फ इस बात की नहीं है कि परियोजना पुरानी है या नई.. बल्कि इस बात की भी है कि उसकी आधिकारिक समय-रेखा क्या कहती है.
यह मामला इसलिए भी अहम हो जाता है क्योंकि सुप्रीम कोर्ट ने नवंबर 2024 के एक अहम फैसले में कहा था कि विधायक, सांसद, न्यायाधीश, आईएएस, आईपीएस और पत्रकार जैसे प्रभावशाली वर्गों को सरकारी भूमि के आवंटन में विशेष श्रेणी बनाकर रियायत या प्राथमिकता देना संविधान के अनुच्छेद 14 में निहित समानता के सिद्धांत के अनुरूप नहीं है. अदालत ने यह भी साफ किया कि राज्य के संसाधनों का वितरण पारदर्शी, न्यायसंगत और समान अवसर के सिद्धांत पर होना चाहिए.
यह फैसला सीधे नकटी प्रकरण पर लागू नहीं होता. लेकिन सरकारी जमीन और सार्वजनिक संसाधनों के वितरण में पारदर्शिता का संवैधानिक मानदंड जरूर स्थापित करता है. ऐसे में जब किसी बड़े सरकारी प्रोजेक्ट से जुड़ी जमीन और सत्ता के शीर्ष स्तर से जुड़े अधिकारी के परिवार का नाम एक साथ सामने आता है. तो स्वाभाविक रूप से पारदर्शिता की अपेक्षा बढ़ जाती है.
अब सबसे बड़ा सवाल यही है कि अगर सब कुछ पूरी तरह नियमों के अनुरूप हुआ है. तो सरकार विधायक आवास परियोजना की पूरी टाइमलाइन सार्वजनिक क्यों नहीं करती? पहला प्रस्ताव कब बना? नकटी का चयन कब हुआ? विभागीय स्वीकृतियां कब मिलीं? जमीन से जुड़ी प्रक्रियाएं किस तारीख को पूरी हुईं? और क्या इन सभी घटनाओं के बीच किसी संभावित हितों के टकराव (Conflict of Interest) की समीक्षा कभी की गई?
इन सवालों के जवाब सिर्फ इस मामले का विवाद खत्म नहीं करेंगे. बल्कि सरकार की पारदर्शिता पर जनता का भरोसा भी मजबूत करेंगे.
क्योंकि सवाल सिर्फ 2.60 एकड़ जमीन या 25 करोड़ रुपये का नहीं है. सवाल यह है कि अगर विधायक कॉलोनी का सपना 15-20 साल पुराना था. तो नकटी का भविष्य सबसे पहले किसने पढ़ लिया था- सरकार ने या किसी और ने???
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