कैंसर पीड़ित पत्नी को बाइक पर लेकर भटक रहा पति, कबीरधाम में जेवर, बर्तन और अनाज तक बेचा, इलाज के लिए मिला 10 हजार, वेंटिलेटर पर मानवता

A husband wanders with his cancer-stricken wife on his bike, selling jewelry, utensils, and even grains in Kabirdham, receiving 10,000 rupees for her treatment. Humanity on a ventilator.

कैंसर पीड़ित पत्नी को बाइक पर लेकर भटक रहा पति, कबीरधाम में जेवर, बर्तन और अनाज तक बेचा, इलाज के लिए मिला 10 हजार, वेंटिलेटर पर मानवता

कबीरधाम : कबीरधाम जिले से एक मार्मिक खबर सामने आई है. जहां रेंगाखार क्षेत्र के नगवाही गांव का गरीब किसान अपनी कैंसर पीड़ित पत्नी को इलाज के लिए बाइक में लकड़ी की पटिया बांधकर ले जा रहा है. इलाज के लिए अब पैसे नहीं है. फिर भी उम्मीद का दामन छोड़े बिना पति अपनी पत्नी की इलाज के लिए गांव-गांव अस्पताल के चक्कर लगाते हुए भटक रहा है.
पीड़ित परिवार ने कुछ दिन पहले ही गृह मंत्री से मदद मांगी थी. जिस पर 10 हजार रुपये की आर्थिक मदद मिली थी. साथ ही सरकारी अस्पताल में भर्ती कराया था. जहां इलाज चल रहा था. लेकिन स्वास्थ्य और बिगड़ते देख डॉक्टरों ने हाथ खड़ा कर दिए है. कैंसर पीड़ित महिला को डिस्चार्ज कर दिया. लेकिन पति ने उम्मीद नहीं छोड़ी और बाइक में लकड़ी की पटिया बांधकर उस पर पत्नी को सुलाकर अस्पताल के चक्कर लगाते इलाज के लिए भटक रहा है.
वनांचल क्षेत्र रेंगाखार तहसील के गांव नगवाही की आदिवासी महिला श्रीमती कपुरा मरकाम पिछले कई महीनों से कैंसर जैसी घातक बीमारी से जूझ रही है. कपुरा बाई के पति समलु सिंग मरकाम उम्र 65 साल ने अपनी जमा-पूंजी पत्नी के इलाज में लगा दी है. इलाज के आस में जो जहां कह रहा वहां पत्नी को पैसे खत्म होने पर बाइक पर पटिया बिछा लेटा कर ले जा रहा. लेकिन अब हालत ऐसी हो गई है कि घर में खाने तक के लाले हैं. अब न तो एंबुलेंस का किराया जुटा पा रहे हैं, न ही चारपहिया वाहन का इंतजाम. मजबूरी में बाइक ही एकमात्र सहारा बन गई है, जहां पत्नी को बांधकर ही ले जाना पड़ता है.
ग्रामीणों के मुताबिक कई दिनों से यह दंपत्ति इलाज की आस में सरकारी मदद और दवाओं के लिए दर-दर भटक रहा है. गरीबी और विवशता की इस कहानी ने इलाके के लोगों को भावुक कर दिया. स्थानीय लोगों ने शासन-प्रशासन से अपील किया कि इस पीड़ित परिवार को फौरन आर्थिक सहायता और चिकित्सकीय मदद उपलब्ध कराई जाए. ताकि महिला का समुचित इलाज हो सके. अब इलाज में लाखों रुपये की जरुरत है. उसको हजार दस हजार की मदद से पूरी नही होनी है तो किसी स्थायी सरकारी सहायता और इलाज का इंतजार है.
ग्रामीणों का कहना है कि इस परिवार ने कई बार सरकारी दफ्तरों व नेताओ के चक्कर लगाए. लेकिन अब तक कोई ठोस मदद या इलाज नहीं मिल पाई है. स्थानीय लोगों ने शासन-प्रशासन से अपील किया कि इस पीड़ित परिवार को तुरंत आर्थिक सहायता और चिकित्सकीय मदद उपलब्ध कराई जाए, ताकि महिला का समुचित इलाज हो सके.
पति का कहना है: “मेरी पत्नी को बचाना चाहता हूं. लेकिन अब कुछ नहीं बचा. आर्थिक संकट के चलते गाड़ी किराए के लिए पैसे नही ऐसे में बाइक पर पत्नी को लेजाने मजबूर हूं. बस अब उम्मीद है कि सरकार या कोई मदद कर दे.”
यह नजारा न सिर्फ आदिवासी की गरीबी की दर्दनाक तस्वीर दिखाता है बल्कि यह भी सवाल उठाता है कि स्वास्थ्य विभाग में लाखो करोड़ो का घोटालेबाज नेताओ अफसरों की मौज के बीच क्या हमारे सिस्टम में ऐसी पीड़ितों तक मदद समय पर कभी पहुंच पाएगी? प्रशासन और समाज दोनों को अब ऐसे मामलों पर तत्काल ध्यान देना होगा, वरना कई समलू सिंह अपनी जंग हार जाएंगे.
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