"जनपद उपाध्यक्ष को भाजपा से बाहर निकालो" नारों के बीच 2 गुटों में बंट गए भाजपाई, शुरु हुई सोशल मीडिया में "लिखाई" और फिर हो गया "बड़ा खेला"

Amidst slogans demanding the expulsion of the Janpad Vice-President from the BJP, party members split into two factions; a war of words erupted on social media, culminating in a major political twist.

"जनपद उपाध्यक्ष को भाजपा से बाहर निकालो" नारों के बीच 2 गुटों में बंट गए भाजपाई, शुरु हुई सोशल मीडिया में "लिखाई" और फिर हो गया "बड़ा खेला"

जशपुर : छत्तीसगढ़ के मुख्यमंत्री विष्णुदेव साय के गृह जिला जशपुर की वीवीआईपी विधानसभा कुंनकुरी के दुलदुला में भाजपा के भीतर गजब का घमासान मचा हुआ है. जनपद उपाध्यक्ष रविन्द्र गुप्ता को भाजपा से बाहर निकालने के प्रस्ताव पर भाजपा कम से कम दुलदुला में 2 खेमे में बंट गई है. एक खेमा रविन्द्र गुप्ता को बीजेपी से बाहर निकालने के प्रस्ताव का खुल्लम खुल्ला विरोध पर उतर आया है. जबकि दूसरा खेमा वो है जिन्होंने जनपद उपाध्यक्ष को पार्टी से बाहर निकालने के प्रस्ताव के समर्थन में हस्ताक्षर किया है.
भारतीय जनता पार्टी दुलदुला मंडल के व्हाट्सएप्प ग्रुप में अभी तक इस मुद्दे पर भारी बहस चल रही है. रविन्द्र गुप्ता के समर्थन में आए भाजपा कार्यकर्ताओं का कहना है कि संगठन जोड़ने और जुड़ने के लिए होता है तोड़ने के लिए नहीं..
रविन्द्र गुप्ता के खिलाफ संगठन की तरफ से की गई कार्रवाई संगठन के सिद्धांतों के खिलाफ है. हर मोर्चे पर सक्रिय रहने वाले जनप्रतिनिधि को हटाने से नकारात्मक संदेश जाएगा. लेकिन एक पक्ष रविन्द्र गुप्ता का हर हाल में निष्कासन चाहता है. निष्कासन के लिए बनाए गए आवेदन में लिखा है कि रविन्द्र गुप्ता खुद कांग्रेसी सदस्यों के समर्थन से उपाध्यक्ष बने हैं. और इनके पिता कांग्रेसी हैं. इसलिए इनके द्वारा कांग्रेसियों को शासकीय योजनाओं का लाभ दिलाया जा रहा है. इनके द्वारा पार्टी विरोधी कार्य किये जा रहे हैं.
निष्कासन के जो कारण बताए गए उसको लेकर भी कम झमेला नहीं हो रहा है. रविन्द्र गुप्ता के समर्थक लिख रहे हैं कि संगठन यह साबित करे कि रविन्द्र गुप्ता ने पार्टी विरोधी कौन सा काम किया है.
इधर भाजपा पिछड़ा वर्ग प्रकोष्ठ के महामंत्री अरुण गुप्ता मूनादी चौपाल के कैमरे के सामने यह बोल चुके है कि जनपद उपाध्यक्ष को पार्टी से बाहर निकालने के प्रस्ताव पर उनसे जबरन हस्ताक्षर कराया गया और ऐसे कई और थे जिनपर साईंन करने के लिए दबाव बनाया गया.
दरअसल 2 दिन पहले दुलदुला भाजपा मंडल अध्यक्ष सरोजनी सिंह के लेटर हेड पर कई सारे भाजपा कार्यकर्ताओं के हस्ताक्षर सहित भाजपा के जिलाध्यक्ष को आवेदन प्रस्ताव देकर रबिन्द्र गुप्ता को पार्टी से हटाने का अनुरोध किया है. यह लेटर जैसे ही सोशल मीडिया में वायरल हुआ बीजेपी के भीतर ही खलबली मच गई.
जनपद उपाध्यक्ष कैमरे के सामने आ गए और कहा कि उन्हें पार्टी से हटाने का प्रस्ताव आश्चर्य जनक और समझ से परे है. उन्होंने कहा" मुझे खुद नहीं पता कि मैं कौन सा गुनाह कर दिया? मेरे पिता को कांग्रेसी बताकर मुझे पार्टी से हटाने का प्रस्ताव रखने का असल मायने क्या है. मुझे नहीं पता.. मैं खुद नेताओं के पास जाकर पूछूँगा कि मेरा कसूर क्या है?
आपको बता दें कि दुलदुला कुनकुरी विधानसभा  का हिस्सा है. इसलिए यहॉ की राजनीति और खाशकर भाजपा के भीतर चल रहे घमासान के काफी मायने निकाले जा रहे हैं. लेकिन सवाल भी उठ रहे है. सवाल ये कि यह विवाद कब थमेगा? विवाद सुलझाएगा कौन? या विवाद बढ़ते बढ़ते आगे कोई बड़ा राजनीतिक संकट पैदा करेगा?
बहरहाल आगे क्या होगा वो तो वक़्त तय करेगा. लेकिन अभी जिस तरह से भाजपा कार्यकर्ता और कुछ सीनियर नेता रविन्द्र गुप्ता के समर्थन में उतरे हैं. और सोशल मीडिया में जो चल रहा है वो भाजपा के लिए सकारात्मक नहीं हो सकता..
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सरगुजा में उठी बगावत की नई आवाज
सरगुजा : छत्तीसगढ़ के उत्तरी बेल्ट सरगुजा और रायगढ़ अंचल से इन दिनों एक ऐसा राजनीतिक तूफान उठ रहा है. जिसकी गूंज आने वाले समय में रायपुर की सत्ता के गलियारों तक सुनाई देगी. कभी भारतीय जनता युवा मोर्चा (BJYM) के प्रदेश अध्यक्ष रहे एक युवा आदिवासी चेहरे ने अपनी ही सरकार की नीतियों और प्रशासनिक कार्यशैली पर सवाल खड़े कर दिए हैं.
रवि भगत को पहले कारण बताओ नोटिस थमाया गया. फिर पद से हटाया गया और अब लैलूंगा में 'साइकिल कांड' के दौरान हुए विरोध प्रदर्शन के बाद सलाखों के पीछे धकेल दिया गया है. लेकिन सवाल यह उठता है कि क्या रवि भगत सिर्फ घटिया साइकिल या डीएमएफ (District Mineral Foundation) फंड का मुद्दा उठा रहे हैं, या फिर वे सरगुजा संभाग में एक नया आदिवासी शक्ति केंद्र बनने की राह पर हैं?
1. बगावत की वजह: DMF फंड और जल-जंगल-जमीन का सवाल
रवि भगत के इस कड़े रुख और बगावत की शुरुआत डीएमएफ (DMF) फंड के मुद्दे से हुई.
क्या है नियम:
नियम के मुताबिक जिस इलाके में खदानें और उद्योग चल रहे हैं. वहां के आदिवासी प्रदूषण और तबाही झेलते हैं. इसलिए डीएमएफ का पैसा सीधे वहीं के प्रभावित गांवों के विकास पर खर्च होना चाहिए.
सीधा सवाल:
खुद इसी आदिवासी अंचल से आने वाले रवि भगत ने अपनी ही सरकार और प्रशासनिक अधिकारियों से पूछ लिया कि तमनार और रायगढ़ के खनन प्रभावित गांवों का हक मारकर यह पैसा कहाँ भेजा जा रहा है?
इसी सवाल के बाद राजनीति गरमा गई. रायगढ़ का इलाका, जिसे राज्य के वित्त मंत्री ओपी चौधरी अपना गढ़ बनाने में लगे हुए हैं. वहाँ रवि भगत की इस आवाज ने सत्ता को असहज कर दिया. सत्ता के पावर सेंटर और रवि भगत के बीच ऑल इज नॉट वेल की खबरें छन-छन कर बाहर आने लगीं.
2. कारण बताओ नोटिस से गिरफ्तारी तक का सफर
अनुशासनहीनता का आरोप:
जब रवि भगत ने डीएमएफ फंड और स्थानीय आदिवासियों की आवाज उठाई। तो पार्टी हाईकमान ने इसे अनुशासनहीनता मानकर शोकाज नोटिस जारी किया.
इस्तीफा और सीधा संघर्ष: रवि भगत ने झुकने के बजाय पार्टी से इस्तीफा दे दिया और स्थानीय मुद्दों (पेड़ों की कटाई, घटिया सड़क निर्माण, और भ्रष्टाचार) को लेकर जनता के बीच चले गए.
साइकिल घोटाला विरोध और गिरफ्तारी: लैलूंगा में सरस्वती साइकिल योजना के तहत आदिवासी बच्चियों को दी जा रही घटिया साइकिलों के विरोध में जब रवि भगत अपने समर्थकों के साथ पहुँचे. तो प्रशासन ने उन्हें गिरफ्तार कर लिया.
मांग:
रवि भगत ने सवाल उठाया कि आदिवासी बच्चियों को घटिया साइकिलें बाँटने के बजाय सरकार सीधे उनके खातों में फंड क्यों स्थानांतरित नहीं कर देती?
गिरफ्तारी के वक्त रवि भगत ने आक्रामक अंदाज में कहा कि “2 तारीख का प्रस्तावित आंदोलन रुकेगा नहीं, हर व्यक्ति रवि भगत बनकर इस आंदोलन को सफल बनाएगा।”
3. सामाजिक और जनसांख्यिकीय गणित: उरांव बनाम कंवरा समीकरण
राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि रवि भगत की गिरफ्तारी सिर्फ एक तात्कालिक कार्रवाई नहीं है. बल्कि यह संदेश देने की कोशिश है कि सत्ता और नेतृत्व के खिलाफ उठने वाली आवाज को बर्दाश्त नहीं किया जाएगा. हालांकि, यह दांव पासा उल्टा भी कर सकता है.
1. आबादी का गणित: रवि भगत उरांव जनजाति से आते हैं. छत्तीसगढ़ की कुल जनसंख्या में उरांव समुदाय की हिस्सेदारी लगभग 9% के आसपास है.
2. मुख्यमंत्री का समीकरण: राज्य के मुख्यमंत्री विष्णुदेव साय कंवर समुदाय से आते हैं, जिसकी जनसंख्या राज्य में करीब 11% से ज्यादा है.
3. सरगुजा का जनमत: पिछले चुनाव में भारतीय जनता पार्टी ने सरगुजा संभाग की सभी 14 सीटें जीतकर क्लीन स्वीप किया था.ऐसे में उरांव बहुल इलाकों में रवि भगत का उभार भाजपा के बने-बनाए समीकरणों को बिगाड़ सकता है.
4. क्या मैदानी अंचल के अमित बघेल की तर्ज पर उभरेगा सरगुजा का नया शक्ति केंद्र?
मैदानी इलाकों में जिस तरह जय जोहार पार्टी/क्रांति सेना के अमित बघेल ने 'छत्तीसगढ़ियावाद' के मुद्दे पर कांग्रेस और भाजपा दोनों की नींद उड़ा रखी है (और लंबे समय तक जेल में रहने के बाद हाल ही में जमानत पर छूटे हैं. ठीक उसी तर्ज पर क्या रवि भगत भी सरगुजा और रायगढ़ अंचल में एक नया क्षेत्रीय/आदिवासी शक्ति केंद्र बन जाएंगे?
छत्तीसगढ़ में अतीत का इतिहास यह भी दर्शाता है कि भाजपा की अनुशासित कार्यशैली में जो भी बड़ा चेहरा पार्टी लाइन से अलग हटा, उसका करियर धीरे-धीरे हाशिए पर चला गया. चाहे बस्तर के सोहन पोटाई हों, सरगुजा संभाग के वरिष्ठ नेता नंदकुमार साय हों, या फिर ननकीराम कंवर—कई बड़े आदिवासी नेताओं को किनारे किया जा चुका है.
निष्कर्ष: सत्ता के लिए नई सिरदर्दी या बगावत का अंत?
रवि भगत का यह तेवर सिर्फ वित्त मंत्री ओपी चौधरी ही नहीं, बल्कि मुख्यमंत्री विष्णुदेव साय और रायगढ़-सरगुजा अंचल की पूरी प्रशासनिक व्यवस्था के लिए एक बड़ी चुनौती बनता दिख रहा है.
क्या रवि भगत जेल से बाहर आकर अपने संघर्ष को एक बड़े जन-आंदोलन में बदल पाएंगे? या फिर अनुशासित संगठन की मशीनरी इस बगावत को शांत कर देगी? यह तो आने वाला वक्त बताएगा. लेकिन इतना तय है कि सरगुजा की वादियों में उठा यह तूफान रायपुर की सत्ता को आराम से बैठने नहीं देगा..
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