सड़क से भी सस्ती जिंदगी!, चारपाई पर तड़पती रही बीमार महिला ,सड़क नहीं होने के कारण कंधों पर ढोया गया विकास का सच, अब आर-पार की मांग
Life is cheaper than the road! A sick woman writhed on a cot, the reality of development carried on shoulders due to the lack of roads, now demanding a thorough investigation.
बलरामपुर/कुसमी : बलरामपुर जिला से आई तस्वीर सिर्फ एक बीमार महिला की नहीं है. बल्कि यह उस व्यवस्था पर करारा तमाचा है जो गांव-गांव तक विकास पहुंचाने के दावे तो करती है. लेकिन कुसमी विकासखंड के बालापानी गांव में एक गंभीर रुप से बीमार महिला को खटिया पर बैठाकर चार ग्रामीणों ने कंधे पर उठाया एक आदमी खाने पिने का समाग्री और कई किलोमीटर पैदल चलकर लक्ष्मणपुर तक पहुंचाया.
वजह साफ है गांव तक सड़क नहीं है. 108 एम्बुलेंस सेवा गांव के भीतर नहीं पहुंच सकी. जब मरीज को मुख्य सड़क तक लाया गया. तब जाकर उसे अस्पताल ले जाया जा सका. महिला के शरीर में सूजन थी. हालत बिगड़ती जा रही थी. हर पल की देरी जानलेवा हो सकती थी. लेकिन यहां जिंदगी से ज्यादा बड़ी समस्या “सड़क” निकली.
सरकार प्रधानमंत्री जनमन योजना के तहत हर गांव तक पक्की सड़क पहुंचाने का दावा तो करती है. लेकिन बालापानी गांव में आज भी लोग कंधों पर जिंदगी ढोने को मजबूर हैं.
यह गांव आदिवासी बृजिया समाज का है. जहां विकास की रोशनी अब तक नहीं पहुंची. बरसात में हालात और भयावह हो जाते हैं. कीचड़ से भरे रास्तों पर चलना मुश्किल, एम्बुलेंस पहुंचना नामुमकिन.. सवाल यह है कि क्या इन गांवों के लोग सिर्फ आंकड़ों और भाषणों का हिस्सा बनकर रह जाएंगे?
ग्रामीणों का साफ कहना है“रोड नहीं तो विकास नहीं.” कई बार गुहार लगाई गई, आवेदन दिए गए, अधिकारियों को बताया गया, लेकिन नतीजा शून्य..
आज एक बीमार महिला की पीड़ा ने उस सच्चाई को उजागर कर दिया है. जिसे अब तक कागजों में दबाया जा रहा था. यह घटना सिर्फ प्रशासन की लापरवाही नहीं, बल्कि उस सोच पर सवाल है जहां दूरस्थ आदिवासी गांवों की समस्याएं प्राथमिकता नहीं बन पातीं.
बालापानी की जनता पूछ रहा है क्या हमारी जिंदगी की कीमत एक सड़क से भी कम है? अब प्रशासन के सामने चुनौती है या तो इस दर्द को सुने और सड़क बनाए, या फिर विकास के दावों पर उठते सवालों का सामना करे.
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