छुरा ब्लॉक के-सरकड़ा गांव में जल संकट, ग्रामीणों का फूटा आक्रोश, कलेक्टर से लगाई इंसाफ की गुहार, तालाब पर कब्जे की साजिश!
Water crisis in Sarkada village of Chhura block, villagers burst out in anger, appealed to the collector for justice, conspiracy to occupy the pond!
गरियाबंद/छुरा : गरियाबंद जिले के छुरा ब्लॉक सरकड़ा गांव में इन दिनों पानी को लेकर भीषण संकट खड़ा हो गया है. गांव का एक मात्र निस्तारी तालाब जो पिछले एक दशक से आमजन के स्नान, मवेशियों को पानी पिलाने और घरेलू उपयोग के लिए जीवनरेखा बना हुआ था. अब निजी स्वार्थ की बलि चढ़ता दिखाई दे रहा है. आरोप है कि जो तालाब कभी सामुदायिक निर्माण और उपयोग का प्रतीक था. अब एक प्रभावशाली परिवार द्वारा पूरी तरह अपने कब्जे में लेकर मछली पालन के व्यवसाय में बदला जा रहा है.
तालाब बना था जनता की ज़रूरत से, कब्जा हुआ चुपचाप!
गांव वालों के मुताबिक यह तालाब करीब 70 साल पहले गांव के लोगों द्वारा अपने-अपने खेतों की जमीन देकर सामूहिक प्रयासों से बनवाया गया था. इसका उपयोग पूरे गांव के लोग सार्वजनिक जलस्रोत के रुप में कर रहे थे. लेकिन अचानक यह खबर सामने आई कि यह तालाब अब राजस्व अभिलेखों में एक पूर्वज मालगुजार के नाम पर दर्ज है और अब उनके पुत्र राजीव दीवान, उनकी पत्नी और बेटे के नाम पर स्वामित्व में दर्ज कर दिया गया है.
गांव वालों को इस जमीन के नामांतरण की जानकारी ही नहीं थी. जब तक वे समझ पाते, तब तक तालाब को मछली पालन के लिए छोटे-छोटे खण्डों में बांटकर हेचरी के रुप में इस्तेमाल किया जाने लगा. अप्रैल 2025 में तो हद तब हो गई जब गर्मी के बीच-बीच में तालाब का सारा पानी निकालकर उसमें मछली बीज डाले गए. जिससे पूरा गांव जल संकट में फंस गया.
बूंद-बूंद को तरस रहा है गांव, मवेशी बेहाल
भीषण गर्मी में सरकड़ा गांव के सैकड़ों लोग और उनके मवेशी अब बूंद-बूंद पानी के लिए भटक रहे हैं. गांव की महिलाएं सुबह से लेकर दोपहर तक पानी की तलाश में भटक रही हैं. कई जगह 2-3 किलोमीटर दूर से पानी लाना पड़ रहा है. बच्चों की पढ़ाई, बुजुर्गों की दवाइयों और पशुओं के चारे-पानी का इंतजाम सब कुछ इस संकट की भेंट चढ़ चुका है.
गांव की महिला कहती हैं, हम गरीब लोग हैं. तालाब में नहाते, मवेशी नहलाते, वहीं से पानी पीते थे. अब सब छीन लिया गया. वो भी बिना पूछे..
पानी निजी नहीं, जीवन है – गांव में फूटा आक्रोश
सरकड़ा के सरपंच प्रतिनिधि और अन्य ग्रामीणों ने कलेक्टर गरियाबंद को 19 मई 2025 को एक सामूहिक आवेदन सौंपा है. जिसमें उन्होंने मांग की है कि तालाब को फौरन शासन के अधीन किया जाए और उसे फिर से सार्वजनिक उपयोग के लिए उपलब्ध कराया जाए.
गांव के बुजुर्ग का कहना है. हमने अपने खेतों का टुकड़ा दिया ताकि गांव को पानी मिले. लेकिन आज हम ही दर-दर भटक रहे हैं. ये अन्याय है. धोखा है..
ग्रामीणों ने जिला प्रशासन से अपील की है कि वह फौरन तालाब की वर्तमान स्थिति का स्थलीय निरीक्षण करे और शासन के जरिए इसे सार्वजनिक संपत्ति घोषित करे. साथ ही तालाब में फिर से जलभराव कर ग्रामीणों की मूलभूत जल आवश्यकता को पूरा किया जाए.
ग्रामीणों का यह भी आरोप है कि मछली पालन में उपयोग हो रहे रासायनिक चारे से पहले भी तालाब का पानी प्रदूषित हो चुका है. जिससे कई बच्चों को त्वचा रोग हुए हैं.
कानूनी सवाल भी खड़े: कैसे हुआ नामांतरण?
यह मामला अब सिर्फ सामाजिक नहीं, बल्कि कानूनी सवालों को भी जन्म दे रहा है. अगर यह तालाब सार्वजनिक उपयोग में था. और ग्रामीणों ने सामूहिक श्रम से इसे बनाया था. तो किस प्रक्रिया से यह एक परिवार के नाम पर दर्ज हो गया? क्या ग्राम पंचायत को इस पर कोई जानकारी दी गई? क्या राजस्व विभाग ने नामांतरण से पहले गांववालों की सहमति ली?
इन सभी सवालों के जवाब प्रशासन को देने होंगे.
संवेदनशील मुद्दा बना राजनीतिक रंग
यह मुद्दा अब धीरे-धीरे राजनीतिक रंग भी लेता जा रहा है. कुछ स्थानीय जनप्रतिनिधियों ने भी सरकड़ा का दौरा कर समर्थन जताया है. कई सामाजिक कार्यकर्ताओं ने इसे “जन जल अधिकार” का उल्लंघन बताया है और इसे जल स्रोतों के निजीकरण की एक खतरनाक मिसाल कहा है.
आख़री सवाल – क्या गांव की प्यास बुझेगी?
अब पूरा सरकड़ा गांव इस सवाल पर टिक गया है – क्या शासन तालाब को फिर से जनता की संपत्ति मानेगा? क्या भीषण गर्मी में अभि-सरकड़ा गांव को राहत मिलेगी..
यह तो वक्त बताएगा, लेकिन फिलहाल अभि-सरकड़ा गांव की सूखी प्यास एक सवाल बनकर प्रशासन के दरवाजे पर खड़ी है – पानी किसका, हक किसका?
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