गरियाबंद जिला में 7 साल से जमे उपवनमंडलाधिकारी, पद बदला, लेकिन जिला नहीं, विभागीय हलकों में चर्चा तेज, कठघरे में विभागीय व्यवस्था और तबादला नीति

Sub-Divisional Forest Officer stationed in Gariaband district for seven years sees a change in designation but not in district; the matter is generating a buzz in departmental circles, placing the departmental system and transfer policy under scrutiny.

गरियाबंद जिला में 7 साल से जमे उपवनमंडलाधिकारी, पद बदला, लेकिन जिला नहीं, विभागीय हलकों में चर्चा तेज, कठघरे में विभागीय व्यवस्था और तबादला नीति

गरियाबंद  : छत्तीसगढ़ शासन वन विभाग द्वारा 64 सहायक वन मंडलाधिकारियों (SDO) की तबादला सूची जारी की गई है. इस लिस्ट में गरियाबंद जिले को लेकर कई सवाल खड़े हो रहे हैं. चर्चा है कि कुछ अधिकारी पिछले 10-15 सालों से गरियाबंद जिले के अंदर ही एक रेंज से दूसरे रेंज में घूम रहे हैं, जिले से बाहर नहीं जा रहे हैं.
सबसे चर्चित नाम – मनोज चंद्राकर
लिस्ट में एक नाम गरियाबंद वन मंडल के देवभोग अनुभाग के उप वनमंडलाधिकारी मनोज चंद्राकर का है. स्थानीय जानकारी के मुताबिव उपवनमंडलाधिकारी चंद्राकर गरियाबंद जिले के गरियाबंद वन परिक्षेत्र में रेंजर के रूप में अपनी सेवा की शुरुआत की और लंबे समय तक इसी जिले में पदस्थ रहते हुए गरियाबंद उपवनमंण्डलाधिकारी के पद पर रहने के बाद देवभोग उप वनमण्डलाधिकारी के बाद अब गरियाबंद वन मण्डल अन्तर्गत राजिम उप वन मण्डलाधिकारी के पद पर तबादला एक ही जिले एक ही वन मण्डल में सामान्य तौर पर शासकीय सेवाओं में लंबे समय तक एक ही स्थान पर पदस्थापना को लेकर समय-समय पर स्थानांतरण और प्रशासनिक आवश्यकता के आधार पर अधिकारियों-कर्मचारियों की पदस्थापना में बदलाव किया जाता है. ऐसे में एक ही जिले में लगभग सात साल तक लगातार बने रहने का मामला चर्चा का विषय बना हुआ है.
तबादला आदेश का दूसरा चर्चित नाम राजेंद्र कुमार सोरी का है, जिन्हें देवभोग अनुभाग में पदस्थ किया गया है. बताया जाता है कि सोरी कुछ साल पहले ही देवभोग अनुभाग से तबादला होकर बिलासपुर (कानन पेंडारी) गए थे. अब उनकी फिर से गरियाबंद जिले में वापसी हुई है.
सूत्रों के हवाले से यह भी कहा जा रहा है कि इनके कार्यकाल में हुए कुछ कार्यों को लेकर पहले शिकायतें हुई थीं, जिनमें पंचायत चुनाव के दौरान चुनाव आयोग में शिकायत और फर्जी बिलिंग के आरोप शामिल हैं. सूत्रों के अनुसार एक मामले में आर्थिक अन्वेषण की चर्चा भी है, हालांकि इसकी आधिकारिक पुष्टि नहीं हुई है.
पद बदला, लेकिन जिला नहीं, सबसे बड़ा सवाल यही है 
बताया जा रहा है कि तथाकथित उपवनमंडलाधिकारी गरियाबंद जिले के गरियाबंद वन परिक्षेत्र में रेंजर के रूप में अपनी सेवा की शुरुआत की और लंबे समय तक इसी जिले में पदस्थ रहते हुए गरियाबंद उपवनमंण्डलाधिकारी के पद पर रहने के बाद देवभोग उप वनमण्डलाधिकारी के बाद अब गरियाबंद वन मण्डल अन्तर्गत राजिम उप वन मण्डलाधिकारी के पद पर तबादला एक ही जिले एक ही वन मण्डल में सामान्य तौर पर शासकीय सेवाओं में लंबे समय तक एक ही स्थान पर पदस्थापना को लेकर समय-समय पर स्थानांतरण और प्रशासनिक आवश्यकता के आधार पर अधिकारियों-कर्मचारियों की पदस्थापना में बदलाव किया जाता है. ऐसे में एक ही जिले में करीब सात साल तक लगातार बने रहने का मामला चर्चा का विषय बना हुआ है. 
सबसे बड़ा सवाल यही है कि रेंजर से उपवनमंडलाधिकारी तक पदोन्नति और जिम्मेदारियों में बदलाव के बावजूद पदस्थापना का जिला क्यों नहीं बदला? विभागीय जानकारों का कहना है कि लंबे समय तक एक ही क्षेत्र में पदस्थ रहने से अधिकारी को स्थानीय स्तर पर विभागीय गतिविधियों,वन क्षेत्र, कर्मचारियों और स्थानीय परिस्थितियों की गहरी जानकारी हो जाती है. वहीं दूसरी तरफ अत्यधिक लंबी पदस्थापना को लेकर पारदर्शिता और प्रशासनिक निष्पक्षता के सवाल भी उठ सकते हैं.
तबादला नीति की कसौटी पर सवाल
वन विभाग में स्थानांतरण नीति का उद्देश्य प्रशासनिक संतुलन बनाए रखना और अधिकारियों-कर्मचारियों को अलग-अलग क्षेत्रों में काम करने का अवसर देना भी माना जाता है. ऐसे में गरियाबंद जिले में करीब सात साल से पदस्थ अधिकारी के मामले में यह देखना जरूरी हो जाता है कि इतने लंबे समय तक एक ही जिले में पदस्थ रहने के पीछे कौन-कौन से प्रशासनिक कारण रहे हैं.
स्थानीय स्तर पर अब यह मांग भी उठ सकती है कि संबंधित अधिकारी की पदस्थापना अवधि,पदोन्नति के बाद जारी हुए पदस्थापना आदेश और शासन की स्थानांतरण नीति के अनुरूप उनकी स्थिति की समीक्षा की जाए. 
जवाबदेही और पारदर्शिता जरूरी.
लंबी पदस्थापना अपने आप में किसी अधिकारी के विरुद्ध आरोप साबित नहीं करती. लेकिन जब किसी अधिकारी का एक ही जिले में कार्यकाल असामान्य रूप से लंबा हो,तो प्रशासनिक पारदर्शिता के लिहाज से रिकॉर्ड सार्वजनिक होना और स्थिति स्पष्ट किया जाना जरूरी हो जाता है.
अब देखना होगा कि वन विभाग के उच्चाधिकारी इस मामले में क्या रुख अपनाते हैं और क्या गरियाबंद जिले में उपवनमंडलाधिकारी की करीब सात साल की पदस्थापना की विभागीय स्तर पर समीक्षा की जाती है.
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