गरियाबंद में दूसरी बार कड़कड़ाती ठण्ड में भूख हड़ताल पर परिवार संग बैठने मजबूर मुरहा नागेश, बंदोबस्त की गड़बड़ी बनी परेशानी की जड़
Muraha Nagesh is forced to go on a hunger strike with his family in the bitter cold in Gariaband for the second time; the problem stems from a lack of arrangements.
गरियाबंद : पुश्तैनी जमीन का हक मांगने परिवार सहित मुरहा नागेश कड़कती ठंड में जिला मुख्यालय के गांधी मैदान में बीती रात से भूख हड़ताल पर बैठ गया है. इधर मुरहा की जमीन ढूंढने कलेक्टर ने एसडीएम-तहसीलदार समेत 10 लोगों की टीम गठित की है. जो गांव में बंदोबस्त सुधार में जुटी है.
मुरहा नागेश का परिवार जिसमें दो मासूम बच्चे भी शामिल हैं. इंसाफ़ की आस में खुले आसमान के नीचे रात बिताने को मजबूर है. यह कहानी किसी फिल्म की नहीं बल्कि गरियाबंद के उस सिस्टम की है जो आश्वासन देने में अव्वल और समाधान देने में फिसड्डी साबित हो रहा है.
पुश्तैनी जमीन के हक की लड़ाई में अमलीपदर तहसील के खरीपथरा गांव के मुरहा नागेश ने फिर एक बार भूख हड़ताल शुरु कर दी है. कड़कती ठंड में परिवार के साथ जिला मुख्यालय के गांधी मैदान में बीती रात से उन्होंने अनशन शुरु किया है.
इस मामले की गंभीरता को देखते हुए कलेक्टर ने एसडीएम, तहसीलदार समेत 10 सदस्यीय टीम गठित की है. यह टीम अब गांव जाकर बंदोबस्त रिकॉर्ड सुधार और वास्तविक जमीन की पहचान में जुट गई है.
अब इंसाफ की आस में थक चुके मुरहा नागेश ने कहा कि जब तक जमीन हमें वापस नहीं मिलती, तब तक हम मैदान नहीं छोड़ेंगे. उन्होंने अब तक कई बार तहसील और राजस्व विभाग के अधिकारियों को आवेदन दिया. लेकिन हर बार सिर्फ़ “जल्द समाधान होगा” का जवाब मिल म गरीब लोग हैं, हमारे पास लड़ाई लड़ने के साधन नहीं, लेकिन जब तक अपनी जमीन वापस नहीं मिलती. तब तक मैदान में बैठे रहेंगे.
ग्रामीणों का कहना है कि मुरहा परिवार की जमीन को लेकर वर्षों से विवाद चला आ रहा है. प्रशासन ने समस्या सुलझाने का भरोसा तो दिया. लेकिन आज तक कोई ठोस कदम नहीं उठाया गया. ग्रामीणों ने कहा कि प्रशासन जब तक जमीन वापस नहीं दिलाता, तब तक यह आंदोलन जारी रहेगा.
उनके साथ क्षेत्र के ग्रामीण और सामाजिक कार्यकर्ता भी समर्थन में पहुंचे. स्थानीय नागरिकों ने प्रशासन से तत्काल हस्तक्षेप कर न्याय दिलाने की मांग की है, ताकि गरीब परिवार को फिर बार-बार धरने की मजबूरी न झेलनी पड़े. हड़ताल स्थल पर बढ़ती भीड़ को देखते हुए पुलिस बल भी मौके पर मौजूद है.
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बात आज की नहीं बल्कि 4 माह पुरानी है तारीख थी 14 जुलाई 2025 अमलीपदर के खरीपथरा गांव के मुरहा नागेश अपनी जमीन को किसी दबंग के कब्जे से मुक्त कराने के लिए अपने बीवी बच्चों संग कलेक्ट्रेट के सामने भूख हड़ताल पर बैठे थे बात सिर्फ धरने तक सीमित नहीं थी हताशा इस कदर थी कि परिवार ने सामूहिक आत्महत्या तक की चेतावनी दे डाली थी. जैसे ही आत्महत्या शब्द कानों में पड़ा प्रशासनिक अमला हरकत में आया दिन भर जद्दोजहद का ड्रामा चला अधिकारियों ने समझाया बुझाया और आखिर में वही किया जो वे सबसे बेहतर करते हैं. एक लिखित आश्वासन थमा दिया. नागेश को भरोसा दिलाया गया कि दो महीने के भीतर उनकी समस्या का जड़ से समाधान कर दिया जाएगा.
जुलाई से नवंबर आ गया दो महीने की मियाद को बीते हुए भी दो महीने हो गए यानी डबल टाइम पूरा हो चुका है. लेकिन मुरहा नागेश की जमीन वह वहीं है दबंग के कब्जे में और मुरहा नागेश वह भी वहीं हैं बस जगह बदल गई है. कलेक्ट्रेट के सामने से वे अब गांधी मैदान पहुंच गए हैं. इस बार ठंड भी कड़कड़ाती है. लेकिन प्रशासन की नींद शायद कुम्भकर्णी है. वही दो मासूम बच्चे वही पत्नी और वही रिश्तेदार पूरा कुनबा इस उम्मीद में रात भर खुले मैदान में सोता रहा कि शायद ठंड की सिहरन से ही साहबों का दिल पसीज जाए. लेकिन यहाँ तो लिखित आश्वासन खुद ठंड से अकड़ा पड़ा है.
मुरहा नागेश के नाम से खसरा क्रमांक 1/83 में 2.680 हेक्टेयर जमीन दर्ज है. इसी जमीन पर मोतीराम समेत अन्य लोगों ने कब्जा करने की कोशिश की थी. अगस्त महीने में जब मुरहा ने पहली बार भूख हड़ताल की थी. तब तहसीलदार ने उसे कब्जा दिलाया था. लेकिन अनावेदकों ने एसडीएम कोर्ट में अपील की और तहसीलदार का आदेश निरस्त करा लिया.
प्रशासन ने दोबारा मुरहा को उसकी जमीन पर कब्जा दिलाया और उसने फसल भी बो दी. लेकिन विरोधियों ने इस बार उसकी पूरी फसल चौपट कर दी. अब मुरहा फिर से उसी जमीन पर स्थायी कब्जे की मांग को लेकर गांधी मैदान में धरने पर बैठा है.
फसल चरवा दिए जाने की घटना क्या यह साबित नहीं करती कि प्रशासन का इकबाल खत्म हो चुका है. उन दो मासूम बच्चों का क्या कुसूर जो इस कड़कड़ाती ठंड में अपने माँ बाप के साथ सिस्टम की लापरवाही की सजा भुगत रहे हैं. मुरहा नागेश का यह धरना सिर्फ एक जमीन का टुकड़ा पाने की जिद नहीं है. बल्कि यह उस भरोसे की लड़ाई है जो सिस्टम ने लिखित में देकर तोड़ दिया है. अब देखना यह है कि प्रशासन की नींद इस बार चाय से टूटती है या फिर इस ठंड को और कड़कड़ाने का इंतजार करती है.
जांच में यह सामने आया है कि 1954 से लेकर 1986 तक के रिकॉर्ड में खसरा क्रमांक 1/83 में मुरहा नागेश का नाम दर्ज है. लेकिन 1990 में बंदोबस्त सुधार के दौरान इस खसरे को दो हिस्सों — 778 और 682 — में विभाजित कर दिया गया. यही वजह है कि अब इस जमीन पर पांच लोगों के नाम दर्ज हैं. जिससे मामला राजस्व विभाग के लिए सिरदर्द बन गया है.
लगातार दूसरी बार भूख हड़ताल पर बैठे मुरहा नागेश न्याय की उम्मीद लगाए हैं. सवाल यह है कि आखिर पुश्तैनी हक के इस विवाद का समाधान कब होगा?
जब इस प्रशासनिक फ्रीज पर अमलीपदर तहसीलदार से सवाल किया गया तो उन्होंने एक बेहद गहन और दार्शनिक जवाब दिया उनका कहना है कि यह समस्या सिर्फ मुरहा नागेश की नहीं है बल्कि उस गांव में सभी जमीनों में समस्या है. वाह क्या तर्क है. यानी एक मरीज का इलाज इसलिए नहीं हो रहा क्योंकि पूरा अस्पताल ही बीमार पड़ा है. तहसीलदार साहब ने यह भी फरमाया कि कार्य किया जा रहा है और इसमें अभी 1 से 2 महीने का और समय लगेगा. मतलब 4 महीने पहले जो काम 2 महीने में होना था वह अब 4 महीने बाद 2 महीने और लेगा. गणित के हिसाब से यह कुल 6 महीने का फास्ट ट्रैक समाधान है. शायद प्रशासन कछुए की चाल को ही सुपर सोनिक स्पीड मानता है.
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गांव के बुजुर्गों ने कहा कि यह सिर्फ एक व्यक्ति की नहीं, बल्कि उस पूरे वर्ग की लड़ाई है. जो आज भी अपने हक के लिए सरकारी दफ्तरों के चक्कर काट रहा है.
“कलेक्ट्रेट से लेकर गांधी मैदान तक का यह संघर्ष इस बात का प्रतीक है कि गरीबों की आवाज़ अब भी सुनी नहीं जा रही.
मुख्य बिंदु
14 जुलाई को कलेक्ट्रेट में पहली भूख हड़ताल
प्रशासन ने जमीन दिलाने का दिया था आश्वासन
चार महीने बीतने के बाद भी नहीं हुआ कोई समाधान
अब गांधी मैदान में परिवार सहित फिर भूख हड़ताल पर बैठे मुरहा नागेश
ग्रामीणों ने प्रशासन से तत्काल न्याय की मांग की



