बिना पूर्व सूचना सत्ता के बुलडोजर तले कुचले गरीबों के प्रधानमंत्री आवास योजना’ के पक्के मकान, इधर रात में दिया नोटिस और सुबह चला दिया अतिक्रमण अभियान
Without any prior notice, the government's bulldozers crushed the pucca houses of the poor under the Pradhan Mantri Awas Yojana (Prime Minister Housing Scheme). Here, a notice was issued at night and an encroachment drive was launched in the morning.
बिना पूर्व सूचना सत्ता के चले बुलडोजर
गौरेला-पेंड्रा-मारवाही : छत्तीसगढ़ के मारवाही जिले के पंडरीपानी क्षेत्र में करीब 15 बेबस परिवारों को बुलडोजर के दम पर बेरहमी से बेदखल करने की कार्रवाई संवैधानिक तकाजों के साथ ही मानवीय नजरिये से भी पूरी तरह से अस्वीकार्य है. प्रशासनिक अमला किस तरह से संवेदनहीन हो चुका है. वह इस छोटे से गांव में दिखा. जहां बिना पूर्व सूचना के इन परिवारों के घरों को ध्वस्त कर दिया गया.
वन विभाग का दावा है कि ये लोग वन भूमि में बसे हुए थे और यहां साल के कीमती वनों की अवैध तरीके से कटाई गई. दूसरी तरफ इन लोगों का दावा है कि ये 30 साल से यहां रहे हैं और उनके मकान प्रधानमंत्री आवास योजना के तहत बनाए गए थे. यही नहीं, इन लोगों का आरोप है कि उनकी महिलाओं के साथ सरकारी अमले ने मारपीट तक की.
सवाल तो यही है कि बिना किसी वैकल्पिक व्यवस्था के साथ इन बेबस लोगों के घरों को कैसे ध्वस्त कर दिया गया? जिस योजना का मकसद गरीबों को छत देना है. उसी योजना के घर को प्रशासन ने मिट्टी में मिला दिया.
इस अचानक हुई कार्रवाई ने न सिर्फ छत छीनी, बल्कि बच्चों की शिक्षा और भविष्य पर भी प्रहार किया है. मलबे के नीचे छोटे-छोटे बच्चों की किताबें, स्कूल ड्रेस, राशन और दैनिक उपयोग की सभी वस्तुएं दब गईं. वर्तमान में ये परिवार अपने मासूम बच्चों के साथ खुले आसमान के नीचे रहने को मजबूर हैं. तपती धूप और अनिश्चित भविष्य के बीच इन परिवारों के पास अब सिर छुपाने की भी जगह नहीं बची है.
नीय ग्रामीणों का कहना है कि प्रशासन और रसूखदारों की सांठगांठ के चलते हमेशा गरीबों को ही निशाना बनाया जाता है. यह घटना प्रदेश की न्याय व्यवस्था और प्रशासनिक संवेदनशीलता पर गंभीर सवाल खड़े करती है. क्या इस देश में गरीब, आदिवासी और दलित परिवारों के आशियाने की कोई कीमत नहीं है? जहाँ एक ओर रसूखदारों के अवैध निर्माणों पर आंखें मूंद ली जाती हैं. वहीं सालों से रह रहे गरीबों को बेघर करने में प्रशासन पल भर की भी देरी नहीं करता.
आसमान के नीचे बचपन और भविष्य
दरअसल ऐसी कार्रवाइयों को अपवाद नहीं कहा जा सकता. ये घटनाएं एक सिलसिले में ही देखी जानी चाहिए. जहां कथित विकास की सर्वाधिक कीमत मजलूमो और बेबसों को चुकानी पड़ रही है. और इस मामले में छत्तीसगढ़ एक मॉडल बनता जा रहा है. जहां राजधानी रायपुर से लेकर हसदेव और बस्तर तक विकास के नाम पर लोगों को बेदखल किया जा रहा है.
राजधानी रायपुर से सटे नकटी गांव में विधायकों की कालोनी बनाए जाने के नाम पर 85 घरों को बेदखल करने की कोशिश की गई. लेकिन भारी विरोध की वजह से ही यह कार्रवाई टल सकी थी. हालांकि यह कहना मुश्किल है कि सरकारी अमला वहां फिर कब पहुंच जाए?
यही हाल तूता माना का है. जहां सरकार ने फिल्म सिटी प्रस्तावित कर रखी है और जिस कंपनी को इसका ठेका दिया गया है. उसके कारिंदे ग्रामीणों को धमकाते नजर आ रहे हैं.
यह कैसी उलटबांसी है कि गौरेला में बेबस दलितों, आदिवासियों को साल के पेड़ों की कथित अवैध कटाई के नाम पर बेदखल कर दिया जा रहा है. और हसदेव से लेकर तूता-माना तक हजारों पेड़ों के काटने की सरकारी तैयारी है.
गौरेला की घटना बता रही है कि कैसे सरकार अपनी जवाबदेही से दूर होती जा रही है. बेशक अगर अवैध तरीके से लोग रहे हैं. तो उन पर किसी भी कार्रवाई से पहले पूरी जांच तो हो. क्या उन्हें वैकल्पिक व्यवस्था नहीं मिलनी चाहिए? क्या जवाबदेहियां तय नहीं होनी चाहिए?
वाकई यह दुखद है कि चुनी हुई सरकारें अपने ही नागरिकों के साथ लगातार दोयम दर्जे का व्यवहार कर रही हैं. अपनी जमीन और घर से बेदखल होने का क्या दर्द होता है. ये वही लोग बता सकते हैं. जिन्होंने अपनी मेहनत और पसीने से इसे बनाया है.
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रात में दिया नोटिस और सुबह चला दिया अतिक्रमण अभियान
अंबिकापुर : अंबिकापुर शहर के महामाया पहाड़ स्थित रिजर्व फॉरेस्ट क्षेत्र में वन विभाग और प्रशासन की संयुक्त टीम ने शुक्रवार को अतिक्रमण हटाने की बड़ी कार्रवाई की. वन विभाग और पुलिस की संयुक्त टीम बुलडोजर के साथ डबरीपानी पहुंची और 20 अवैध मकानों को ध्वस्त किया.
जिन अतिक्रमणकारियों को हाईकोर्ट से स्थगन आदेश मिला है. उन्हें फिलहाल कार्रवाई से अलग रखा गया है. वन विभाग के मुताबिक महामाया पहाड़ के कक्ष क्रमांक 2581 और 2582 में किए गए अवैध कब्जों को हटाने के लिए मार्च 2026 में 157 लोगों को अंतिम बेदखली नोटिस जारी किया गया था. नोटिस की अवधि ल्ज्तं होने के बाद भी कार्रवाई नहीं होने पर भाजपा पार्षद आलोक दुबे ने मुख्यमंत्री विष्णुदेव साय से शिकायत की थी. इसके बाद कलेक्टर अजीत वसंत के मार्गदर्शन में प्रशासन ने कार्रवाई तेज की.
डबरीपानी क्षेत्र के 54 लोगों को आखरी नोटिस जारी किया गया था. गुरुवार रात वन विभाग की टीम ने इलाके में पहुंचकर मकान खाली करने की घोषणा की और नोटिस चस्पा किए. शुक्रवार सुबह फॉरेस्ट एसडीओ श्वेता कम्बोज के नेतृत्व में वन अमला और पुलिस बल मौके पर पहुंचा और बुलडोजर से अवैध निर्माण हटाने की कार्रवाई शुरू की गई.
भाजपा पार्षद आलोक दुबे ने आरोप लगाया कि अंतिम बेदखली नोटिस की अवधि खत्म होने और पुलिस बल उपलब्ध होने के बावजूद वन विभाग ने कार्रवाई में देरी की. उन्होंने कहा कि रिजर्व फॉरेस्ट भूमि पर बाहरी लोगों द्वारा अवैध कब्जा किया गया है. मुख्यमंत्री से शिकायत के बाद प्रशासन सक्रिय हुआ और अब अतिक्रमण हटाया जा रहा है.
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