गरीब आदिवासी परिवार का सामाजिक बहिष्कार, प्रधानमंत्री आवास तोड़ा गया, प्रशासन की जल्दबाजी और लापरवाही पर उठ रहे गंभीर सवाल
A poor tribal family was socially boycotted, the Prime Minister's residence was demolished, and serious questions were raised about the administration's haste and negligence.
गरियाबंद/फिंगेश्वर : ग्राम पंचायत पाली में आदिवासी ओंकार सिंह ठाकुर का परिवार आज न्याय की गुहार लगा रहा है. लेकिन शासन-प्रशासन की चुप्पी कई सवाल खड़े कर रही है. यह मामला न सिर्फ एक गरीब आदिवासी परिवार का मकान तोड़े जाने तक सीमित है. बल्कि यह इस बात की गवाही देता है कि आज भी गांवों में पुराने जमाने के सामाजिक बहिष्कार और दबंगई के नियम चल रहे हैं. और प्रशासन की भूमिका भी सवालों के घेरे में है
पीड़ित परिवार का आरोप है कि ग्रामीणों ने पहले उनका सामाजिक बहिष्कार किया गया है. न कोई बातचीत करता है. न दुकान से सामान देता है. इसके बाद उनके प्रधानमंत्री आवास को भी तोड़ डाला गया.
परिवार का कहना है कि प्रशासन की टीम ने जल्दबाजी में गली का रास्ता चिन्हित किया और चली गई. लेकिन बाद में ग्रामीण औजार लेकर आए और निर्माणाधीन मकान को तोड़ डाला. यहां तक कि घर में लगी खिड़की और चौखट तक निकाल ले गए.
सबसे बड़ी बात यह है कि इस परिवार के पास जमीन का आबादी पट्टा मौजूद है. फिर भी ग्रामीणों ने उस जमीन को गली बताकर मकान को अवैध घोषित कर दिया. और प्रशासन ने भी कार्रवाई कर दी.
सरपंच तक को मकान तोड़ने की कोई सूचना नहीं दी गई. यह साफ दिखाता है कि कहीं न कहीं प्रशासन ने बिना गहराई से जांच किए जल्दबाजी में कार्यवाही की है. जनपद सीईओ का कहना है कि नाप जोख कर पट्टे से बाहर का हिस्सा तोड़ा गया है. लेकिन सवाल यही है कि जब पट्टा मान्य है तो आखिर मकान तोड़ा क्यों गया?
प्रशासन पर सीधे सवाल
क्या आज भी सामाजिक बहिष्कार जैसे पुराने जमाने के नियम गांव में चलेंगे?
क्या पट्टा होने के बावजूद गरीब आदिवासी परिवार को प्रधानमंत्री आवास का हक नहीं मिलेगा?
क्या प्रशासन ने दबाव में आकर मकान तोड़ा?
क्या शासन-प्रशासन के नियम यहां लागू नहीं होते?
बड़ा सवाल
जिस प्रधानमंत्री आवास योजना को लेकर सरकार बड़े-बड़े दावे करती है, उसी योजना के तहत जब आदिवासी को मकान मिला तो उसके घर को तोड़ दिया गया। क्या यह गरीब के साथ खुला अन्याय नहीं है.
ग्राम पाली में घटित यह मामला न सिर्फ प्रशासन की कार्यप्रणाली पर गंभीर सवाल खड़े करता है, बल्कि यह भी दिखाता है कि आज भी आदिवासी और गरीब परिवार को न्याय पाना कितना कठिन है. फिलहाल पीड़ित परिवार इंसाफ के लिए दर-दर भटक रहा है और यह देखना होगा कि शासन-प्रशासन इस अन्याय पर कब कार्रवाई करता है.
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