इस स्कूल में कुत्तों का स्वागत करने शिक्षा तंत्र बेबस!, आदेश और बोर्ड दोनों सरकारी, संस्था प्रमुख के सामने अजीब असमंजस की स्थिति

The education system is helpless in welcoming dogs into this school! Both the order and the board are government-run, leaving the head of the institution in a state of confusion.

इस स्कूल में कुत्तों का स्वागत करने शिक्षा तंत्र बेबस!, आदेश और बोर्ड दोनों सरकारी, संस्था प्रमुख के सामने अजीब असमंजस की स्थिति

बिलासपुर/बोदरी : हाल ही में स्कूल शिक्षा विभाग का एक फरमान काफी चर्चित रहा. जिसमें स्कूल के संस्था प्रमुख को स्कूल परिसर में आवारा कुत्तों पर निगरानी रखने कहा गया. इधर बिलासपुर जिले में बोदरी स्कूल के संस्था प्रमुख के सामने अजीब असमंजस की स्थिति है. जहां नगर पालिका ने ठीक स्कूल के सामने एक बोर्ड लगाकर इसे कुत्तों के खाना परोसने का स्थान तय कर दिया है… यह तस्वीर सोशल मीडिया में भी जमकर वायरल हो रही है और नए तरह की समस्या का समाधान खोजा जा रहा है.
दरअसल छत्तीसगढ़ के बिलासपुर ज़िले में एक सरकारी स्कूल चर्चा में है. पढ़ाई के लिए नहीं, बल्कि सरकार के दो विभागों की महान समन्वय कला की वजह से हालत ऐसी है कि स्कूल शिक्षा विभाग ने फरमान जारी किया है. “विद्यालय परिसर के आसपास आवारा कुत्तों की निगरानी की जाए और उन्हें दूर रखा जाए. ताकि बच्चों को रेबीज़ से बचाया जा सके.”
लेकिन मानो आदेश आधे में पहुंच गया हो.. उसी विद्यालय के मुख्य द्वार पर बोदरी नगर पालिका परिषद ने एक नया सूचना बोर्ड लगा दिया है- सोशल मिडिया में लोग जमकर कमेन्ट कर रहे हैं. किसी ने लिखा कि- 
“कुत्तों को खाना खिलाने वाला स्थान।”
यानि शिक्षा विभाग कह रहा है — “कुत्तों को भगाओ.”
और नगरपालिका कह रही है — “कुत्तों को बुलाओ.”
अब सवाल ये है कि कुत्ते जाएं तो जाएं कहां…..?
स्कूल के अंदर आएं तो नियम का उल्लंघन होगा…
और बाहर रहें तो नगरपालिका के सम्मान में कमी आएगी! 
विद्यालय प्रशासन की हालत किसी परीक्षार्थी जैसी है. प्रश्न पत्र भी कठिन और विकल्प भी उलझे हुए.. शिक्षकगण को अब रोजाना द्वार पर खड़े होकर तय करना हैं कि बच्चों का स्वागत पहले हो या कुत्तों का...
कुछ शिक्षकों का कहना है कि कुत्ते अब खुद को विशेष आमंत्रित अतिथि की तरह महसूस कर रहे हैं— दुम हिलाते हुए प्रवेश करते हैं।स्कूल के एक शिक्षक ने नाम न बताने की शर्त पर कहा कि “हम तो सोच रहे हैं. अगली परीक्षा में ‘कुत्तों का व्यवहार और सरकारी तंत्र’ विषय जोड़ दिया जाए. ताकि बच्चे यथार्थवादी शिक्षा पाएं.”
विद्यालय प्रबंधन अब उलझन में है.
किसकी सुने? कुत्तों को भगाए या स्वागत करे?
आदेश का पालन करे या बोर्ड का सम्मान?
फिलहाल कुत्ते खुश हैं. बच्चे भ्रमित हैं. शिक्षक बेबस हैं…और सरकारी तंत्र?
वह तो हमेशा की तरह निर्देश जरूर दे रहा है-समन्वय बाद में देखेगा.
ताजा खबर से जुड़ने के लिए इस लिंक पर क्लिक करें
https://chat.whatsapp.com/LEzQMc7v4AU8DYccDDrQlb?mode=ac_t