मुख्यमंत्री जनमन योजना में भ्रष्टाचार का आरोप, गरियाबंद में 3 साल बाद भी अधूरे 38 कमार आदिवासियों के आवास, 95 लाख डकार गए ठेकेदार!
Corruption in the Chief Minister's Janman Yojana; houses for 38 Kamar tribals remain incomplete even after 3 years in Gariaband; contractor embezzles Rs 95 lakh!
गरियाबंद : सरकारें योजनाएं बनाती हैं ताकि समाज के सबसे कमजोर और हाशिए पर खड़े वर्ग को मुख्यधारा में लाया जा सके. अति पिछड़ी जनजाति के उत्थान के लिए लाई गई ‘जनमन योजना’ के तहत 2.50 लाख रुपये की लागत से पक्के आवास देने का प्रावधान किया गया था. इसका मकसद उन गरीब आदिवासियों को छत मुहैया कराना था. जिन्होंने पीढ़ियों से पक्के मकान का मुंह तक नहीं देखा. लेकिन धरातल पर इस योजना की सच्चाई सरकारी दावों से कोसों दूर और भ्रष्टाचार की दीमक से खोखली हो चुकी है.
गरियाबंद जिले से एक ऐसा ही सनसनीखेज और शर्मनाक मामला सामने आया है. जहां व्यवस्था और ठेकेदारों की मिलीभगत ने 38 गरीब कमार परिवारों के सपनों का सौदा कर लिया है.
मिली जानकारी के मुताबिक गरियाबंद जिले के अंतर्गत आने वाले ग्राम पंचायत छोटे गोबरा के आश्रित ग्राम बड़े गोबरा में अति पिछड़ी कमार जनजाति के विकास के लिए ‘आदिम जाति कल्याण विभाग (कमार विकास अभिकरण)’ द्वारा आवास निर्माण की स्वीकृति दी गई थी. प्रत्येक आवास के लिए 2.50 लाख रुपये का बजट तय था. लेकिन विडंबना देखिए कि तीन साल बीत जाने के बाद भी इन गरीब आदिवासियों का घर आज भी आधा-अधूरा और जर्जर हालत में पड़ा है.
इस पूरी योजना में सबसे बड़ा फर्जीवाड़ा पैसों के लेन-देन में हुआ है. नियमानुसार और पारदर्शिता के लिए आवास निर्माण की राशि सीधे हितग्राही के बैंक खाते (Direct Benefit Transfer) में भेजी जानी चाहिए थी.
नियमों की अनदेखी: विभाग ने हितग्राहियों को पैसा देने के बजाय, निर्माण का जिम्मा और पूरी राशि सीधे ठेकेदारों के हाथों में सौंप दी.
95 लाख का बंदरबांट: बड़े गोबरा के हीरालाल कमार समेत कुल 38 हितग्राहियों के आवास बनने थे। इन 38 आवासों के लिए कुल 95 लाख रुपये का बजट था.
काम अधूरा, पैसे गायब: ठेकेदार द्वारा राशि का आहरण कर लिया गया. लेकिन तीन साल बाद भी मकानों की सिर्फ आधी-अधूरी दीवारें ही खड़ी हैं. आज भी हीरालाल कमार और अन्य ग्रामवासी अपने पक्के मकान के इंतजार में दर-दर की ठोकरें खा रहे हैं.
प्रशासन और सरकार पर उठते गंभीर सवाल
इस पूरे घटनाक्रम ने आदिम जाति कल्याण विभाग और स्थानीय प्रशासन की कार्यप्रणाली पर गंभीर प्रश्नचिह्न लगा दिए हैं.
जवाबदेही किसकी है? गरीब आदिवासियों के नाम पर निकाले गए 95 लाख रुपये आखिर कहां गए? जब तीन साल से काम बंद पड़ा है. तो कमार विकास अभिकरण के अधिकारी क्या कर रहे हैं? इस गबन की सीधी जिम्मेदारी किसकी है?
हितग्राही की जगह ठेकेदार को पैसा देना कितना उचित?
आवास योजना का मूल उद्देश्य हितग्राही को सशक्त बनाना और भ्रष्टाचार को रोकना होता है. ऐसे में बीच में ठेकेदार को घुसाकर उसे सीधे भुगतान करना किस नियम के तहत किया गया? यह स्पष्ट रूप से कमीशनखोरी और भ्रष्टाचार का संकेत है.
क्या सरकार ने सच में अपनी आंखों पर पट्टी बांध रखी है?
प्रदेश और केंद्र सरकारें आदिवासी विकास के बड़े-बड़े दावे करती हैं, लेकिन राजधानी से चंद किलोमीटर दूर गरियाबंद में तीन साल से यह धांधली चल रही है और शासन-प्रशासन कुंभकर्णी नींद सो रहा है.
जांच टीम और विभाग मौन क्यों हैं?
इतनी बड़ी अनियमितता के बावजूद अब तक न तो कोई जांच कमेटी बैठी और न ही किसी ठेकेदार या अधिकारी पर कोई एफआईआर (FIR) दर्ज हुई। विभाग की यह चुप्पी मिलीभगत की तरफ़ इशारा करती है.
न्याय की दरकार
बड़े गोबरा के ग्रामीण आज भी यह पूछ रहे हैं कि क्या उनके हिस्से का न्याय कभी उन्हें मिलेगा? यह सिर्फ 38 अधूरे मकानों का मुद्दा नहीं है. बल्कि यह व्यवस्था द्वारा एक अति पिछड़ी जनजाति (PVTG) के शोषण का जीता-जागता उदाहरण है.
जरूरत है कि इस मामले की तत्काल उच्चस्तरीय जांच हो. उन अधिकारियों और ठेकेदारों पर आपराधिक मुकदमा दर्ज कर राशि की रिकवरी की जाए. जिन्होंने इन गरीब आदिवासियों के पक्के घर के सपने को चकनाचूर किया है. अगर ऐसा नहीं होता है तो ‘सबका साथ, सबका विकास’ का नारा इन आदिवासी अंचलों में सिर्फ एक क्रूर मजाक बनकर रह जाएगा.
ताजा खबर से जुड़ने के लिए इस लिंक पर क्लिक करें
https://chat.whatsapp.com/LNzck3m4z7w0Qys8cbPFkB



