खेती करो तो जुर्माना? शिकायत की तो दबाव, आदिवासी किसान के गंभीर आरोपों से गरियाबंद वन विभाग की कार्यशैली पर उठ रहे सवाल, कलेक्टर- होगी जांच
Fines for farming? Complaints can lead to pressure. A tribal farmer's serious allegations are raising questions about the Gariaband Forest Department's working style. The Collector has ordered an investigation.
गरियाबंद/छुरा : गरियाबंद जिले के छुरा क्षेत्र से सामने आया एक मामला इन दिनों चर्चा का विषय बना हुआ है. यहां एक आदिवासी किसान ने वन विभाग के दो कर्मचारियों पर ऐसे आरोप लगाए हैं. जिन्हें सुनकर गांव से लेकर जिला मुख्यालय तक लोग हैरान हैं.
आदिवासी किसान हरेन्द्र कंवर का दावा है कि वह अपनी निजी राजस्व भूमि पर सामान्य कृषि कार्य कर रहा था. सब कुछ सामान्य चल रहा था. लेकिन तभी कथित तौर पर ऐसा घटनाक्रम शुरू हुआ जिसने उसे सीधे शिकायत लेकर कलेक्टर कार्यालय तक पहुंचने पर मजबूर कर दिया.
गरियाबंद वन विभाग की कार्यशैली पर उठते सवाल, कार्रवाई के नाम पर कथित पैसों की मांग
किसान द्वारा कलेक्टर भगवान सिंह उइके और वन मंडलाधिकारी को सौंपी गई लिखित शिकायत में आरोप लगाया कि वन विभाग के एक वन रक्षक और डिप्टी रेंजर ने कार्रवाई का डर दिखाते हुए 50 हजार रुपये की मांग की. शिकायत में यह भी दावा किया कि बाद में 35 हजार रुपये की कथित वसूली की गई. मामला यहीं नहीं रुका. किसान का आरोप है कि जब उसने इस पूरे घटनाक्रम के खिलाफ आवाज उठाने की कोशिश की तो शिकायत वापस लेने के लिए भी दबाव बनाया गया. अगर आरोप सही साबित होते हैं तो यह मामला सिर्फ एक किसान की परेशानी नहीं बल्कि विभागीय कार्यप्रणाली पर भी बड़ा सवाल खड़ा कर सकता है.
जंगल बचाने निकले थे या जंगल का रेट कार्ड लेकर पहुंचे थे?
ग्रामीण इलाकों में अब इस मामले को लेकर तरह-तरह की चर्चाएं हो रही हैं. लोग सवाल पूछ रहे हैं कि अगर जमीन निजी राजस्व भूमि थी तो फिर इतना विवाद क्यों पैदा हुआ? गांव के चौपालों में चर्चा है कि किसान खेत में धान बोने गया था या किसी अदृश्य नियमों की भूलभुलैया में फंस गया था? आखिर ऐसा क्या हुआ कि मामला खेत से निकलकर सीधे प्रशासनिक दफ्तरों की फाइलों तक पहुंच गया?
हालांकि यह भी उतना ही जरूरी है कि जांच पूरी होने से पहले किसी भी पक्ष को दोषी नहीं माना जा सकता. लेकिन आरोपों की गंभीरता ने लोगों की उत्सुकता जरुर बढ़ा दी है.
शिकायत पहुंची प्रशासन तक, अब जांच की घड़ी
किसान ने पूरे मामले की उच्चस्तरीय जांच और दोषी पाए जाने पर विभागीय एवं कानूनी कार्रवाई की मांग की है. शिकायत में यह भी उल्लेख किया गया कि मामले की जानकारी पहले जन-प्रतिनिधियों तक भी पहुंचाई गई थी. अब प्रशासन के पाले में गेंद है. कलेक्टर ने शिकायत मिलने के बाद मामले की जांच कराने और तथ्य सही पाए जाने पर नियमानुसार कड़ी कार्रवाई का आश्वासन दिया है.
जांच बताएगी सच क्या है, लेकिन सवाल अभी से गूंज रहे हैं
फिलहाल इस पूरे मामले में सबसे बड़ा सवाल यही है कि शिकायत में लगाए गए आरोपों में कितनी सच्चाई है. जांच रिपोर्ट आने तक कई सवाल अनुत्तरित रहेंगे. लेकिन एक बात तय है कि इस शिकायत ने वन विभाग की कार्यप्रणाली को लेकर नई बहस जरूर छेड़ दी है. अब सबकी निगाहें जांच पर टिकी हैं. क्योंकि अगर आरोप सही निकले तो मामला सिर्फ एक किसान और दो कर्मचारियों तक सीमित नहीं रहेगा. बल्कि व्यवस्था की जवाबदेही पर भी बड़ा प्रश्नचिह्न खड़ा करेगा.
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