कुसुम के पेड़ पर लाख तोड़ने चढ़े सुखदास की लालच में गई जान, परिवार में पसरा मातम, पत्नी-बच्चों की छीन गया सहारा, प्रशासन से मुआवजे की मांग

Sukhdas, who climbed a Kusum tree to pluck lac, lost his life due to greed. The family was in mourning, the wife and children were deprived of their support. The administration demanded compensation.

कुसुम के पेड़ पर लाख तोड़ने चढ़े सुखदास की लालच में गई जान, परिवार में पसरा मातम, पत्नी-बच्चों की छीन गया सहारा, प्रशासन से मुआवजे की मांग

गरियाबंद : गरियाबंद जिले के अमलीपदर थाना क्षेत्र के घुमरा पदर गांव में इस बार लाख का सीजन उम्मीद नहीं, विडंबना लेकर आया. 35 साल का सुखदास लाख तोड़ने पेड़ पर चढ़ा था… नीचे उतरा तो सीधे चार कंधों पर.. फरवरी से अप्रैल तक जंगलों में कुसुम के पेड़ों पर जमी लाख को ग्रामीण “लाखों की उम्मीद” मानते हैं। पर इस उम्मीद का गणित बड़ा अजीब है. ऊपर पेड़ पर जोखिम 100%, नीचे जेब में सुरक्षा 0%....
सुखदास भी उसी गणित का छात्र था. बेहतर आमदनी का सपना लेकर पेड़ पर चढ़ा. मगर किस्मत की स्लिपरी सतह पर उसका संतुलन फिसल गया. लाख तोड़ते-तोड़ते जिंदगी की डोर ही टूट गई. मौके पर ही मौत हो गई.. परिवार वालों के मुताबिक सुखदास कल से घर से लाख तोड़ने के लिए अपने खेती पर गया था.
ग्रामीण बताते हैं कि लाख तोड़ना कोई पिकनिक नहीं... पूरा स्टंट शो है.. बस फर्क इतना कि यहां ताली नहीं, तेरहवीं होती है.. न रस्सी, न बेल्ट, न हेलमेट.. सुरक्षा उपकरणों की लिस्ट उतनी ही छोटी है जितनी मजदूर की जेब..
सरकारी फाइलों में “आजीविका संवर्धन” मोटे अक्षरों में लिखा रहता है. लेकिन पेड़ पर चढ़ते वक्त मजदूर के पास सिर्फ भरोसा होता है. और वो भी बिना गारंटी कार्ड के....
लाख का बाजार चमकदार है. इससे चूड़ी, पॉलिश, वार्निश, सजावटी सामान बनते हैं. शहरों में शो-पीस चमकते हैं. गांव में चूल्हा.. बेचने वाली टूटी फूटी चप्पल में तो वहीं खरीदने वाले लाखों की कार पर.. जहां 50 ट्रक बेचते हैं तो वहीं तीन या चार ट्रक का टोकन काटते हैं बाकी ….. ?
लेकिन असली सवाल यह है कि जो पेड़ पर जान जोखिम में डालता है. क्या उसकी सुरक्षा भी “प्राकृतिक संसाधन” मानी जाती है.. जिसे खुद संभालो? घर का कमाने वाला हाथ चला गया. पीछे रह गई पत्नी, बच्चे और अधूरा सपना.
गांव में मातम है. प्रशासन से मुआवजे की मांग उठी है. हर हादसे के बाद यही प्रक्रिया दोहराई जाती है. पहले संवेदना, फिर सर्वे, फिर फाइल… और फिर इंतजार...
लाख के इस मौसम में जंगलों में सिर्फ कीट नहीं पनपते, जोखिम भी पनपता है.. हमारे यहां रोजगार का मतलब अक्सर “जुगाड़” होता है और सुरक्षा का मतलब “भगवान भरोसे”.. सवाल यह नहीं कि सुखदास क्यों चढ़ा... सवाल यह है कि हर साल कितने सुखदास चढ़ते हैंऔर कितने उतर पाते हैं? लाख से लाखों कमाने का सपना… लेकिन  व्यवस्था अब भी पेड़ पर चढ़ी है, नीचे उतरने का नाम नहीं ले रही..
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