सरकारी सिस्टम से तेज निकला शिक्षक का जज्बा, संतोष साहू बने मिसाल, अपने वेतन से बनवा दिया टिनशेड, 38 लाख का भवन अब भी अधूरा

A teacher's dedication outpaced the government system; Santosh Sahu set an example by funding the construction of a tin shed from his own salary, while the ₹38-lakh building remains incomplete.

सरकारी सिस्टम से तेज निकला शिक्षक का जज्बा, संतोष साहू बने मिसाल, अपने वेतन से बनवा दिया टिनशेड, 38 लाख का भवन अब भी अधूरा

गरियाबंद/छुरा : सरकारी तंत्र की सुस्त रफ्तार और एक शिक्षक के समर्पण के बीच का अंतर अगर किसी को देखना हो. तो उसे गरियाबंद जिला में छुरा विकासखंड के ग्राम पेंड्रा स्थित शासकीय हाई सेकेंडरी स्कूल पहुंचना चाहिए.
यहां एक तरफ 38.10 लाख रुपये की लागत से बन रहा अतिरिक्त कक्ष महीनों बाद भी अधूरा पड़ा है. तो दूसरी तरफ एक शिक्षक ने अपने वेतन की कमाई खर्च कर बच्चों के लिए टीनशेड बनवा दिया। ताकि उनकी पढ़ाई एक दिन भी प्रभावित न हो.
यह कहानी सिर्फ एक टीनशेड की नहीं, बल्कि उस शिक्षक की सोच की है जिसने सरकारी मदद का इंतजार करने के बजाय अपने विद्यार्थियों के भविष्य को प्राथमिकता दी. पेंड्रा हाई स्कूल में पदस्थ शिक्षक संतोष साहू ने यह साबित कर दिया कि सच्चा शिक्षक केवल किताबों का ज्ञान नहीं देता. बल्कि जरूरत पड़ने पर अपने विद्यार्थियों के लिए स्वयं सहारा भी बन जाता है.
जहां सरकारी निर्माण अटका… वहां शिक्षक ने खुद संभाली जिम्मेदारी
विद्यालय में सालों से अतिरिक्त कक्षों की कमी बनी हुई है. करीब 127 छात्र-छात्राओं वाले इस स्कूल में कक्षाओं के अभाव में पढ़ाई प्रभावित हो रही थी. कई बार विद्यार्थियों को अस्थायी व्यवस्था में बैठाकर पढ़ाना पड़ता था.
इसी परेशानी को देखते हुए शिक्षक संतोष साहू ने विभागीय प्रक्रिया पूरी होने का इंतजार नहीं किया. उन्होंने अपने निजी वेतन से विद्यालय की छत पर टीनशेड का निर्माण कराया. ताकि बच्चों की पढ़ाई निर्बाध रूप से चल सके. आज कक्षा 11वीं और 12वीं के विद्यार्थी उसी टीनशेड के नीचे बैठकर अपने भविष्य को संवार रहे हैं.
सरकारी भवन अब भी अधूरा… बच्चों को नहीं मिला लाभ
विद्यालय के लिए पहले ही 38.10 लाख रुपये की लागत से अतिरिक्त कक्ष निर्माण की स्वीकृति मिल चुकी है. निर्माण कार्य शुरू भी हुआ, लेकिन ठेकेदार की बेहद धीमी कार्यशैली के कारण भवन आज तक पूरा नहीं हो सका.
निर्माण स्थल की स्थिति देखकर साफ नजर आता है कि काम कछुआ चाल से चल रहा है। यदि भवन समय पर बन जाता. तो विद्यार्थियों को अस्थायी व्यवस्था में पढ़ाई करने की नौबत ही नहीं आती.
सरकारी सिस्टम पर भारी पड़ा एक शिक्षक का जज्बा
सबसे बड़ा सवाल यह है कि जिस काम के लिए सरकार ने लाखों रुपये स्वीकृत किए. वह महीनों बाद भी पूरा नहीं हो पाया. लेकिन एक शिक्षक ने अपनी सीमित आय से कुछ ही समय में बच्चों के लिए पढ़ाई की व्यवस्था कर दी.
यह घटनाक्रम सरकारी कार्यप्रणाली और व्यक्तिगत जिम्मेदारी के बीच का अंतर भी उजागर करता है. जहां सरकारी योजनाएं फाइलों और निर्माण की धीमी रफ्तार में उलझ जाती हैं. वहीं एक संवेदनशील शिक्षक अपने कर्तव्य को सबसे ऊपर रखकर मिसाल कायम कर देता है.
ग्रामीण बोले- ठेकेदार और विभाग को नहीं, बच्चों के भविष्य की चिंता
ग्रामीणों, पालकों और जनप्रतिनिधियों का कहना है कि अतिरिक्त कक्ष निर्माण में हो रही देरी का सबसे बड़ा नुकसान विद्यार्थियों को उठाना पड़ रहा है. उनका आरोप है कि निर्माण कार्य की रफ्तार देखकर ऐसा लगता है मानो ठेकेदार को बच्चों की पढ़ाई से कोई सरोकार ही नहीं है.
ग्रामीणों ने प्रशासन से मांग की है कि निर्माण कार्य की गुणवत्ता और प्रगति की जांच कराई जाए. देरी के लिए जिम्मेदार ठेकेदार पर कार्रवाई हो तथा अतिरिक्त कक्ष का निर्माण जल्द पूरा कराया जाए.
समाज के लिए प्रेरणा बने संतोष साहू
आज जब शिक्षा व्यवस्था को लेकर लगातार सवाल उठ रहे हैं, ऐसे समय में शिक्षक संतोष साहू ने अपने कार्य से यह साबित कर दिया कि एक सच्चा गुरु सिर्फ पढ़ाता नहीं, बल्कि विद्यार्थियों के सपनों की रक्षा भी करता है.
क्षेत्र के नागरिकों ने मांग की है कि शिक्षक संतोष साहू को जिला एवं राज्य स्तर पर सम्मानित किया जाए. ताकि शिक्षा के प्रति समर्पण और सेवा की ऐसी मिसालों को उचित पहचान मिल सके..
सवाल जो जवाब मांग रहा है…
“एक शिक्षक ने अपनी जेब से बच्चों के लिए टीनशेड खड़ा कर दिया… अब प्रशासन बताए, 38.10 लाख का सरकारी भवन आखिर कब पूरा होगा?”
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