छत्तीसगढ़ में प्रशासनिक तूफान, धान खरीदी के बीच बड़ी खबर, 2058 समिति प्रबंधकों और कंप्यूटर ऑपरेटरों ने सौंपा सामूहिक इस्तीफा

Chhattisgarh: Administrative storm: Big news amid paddy procurement; 2058 committee managers and computer operators submit mass resignation

छत्तीसगढ़ में प्रशासनिक तूफान, धान खरीदी के बीच बड़ी खबर, 2058 समिति प्रबंधकों और कंप्यूटर ऑपरेटरों ने सौंपा सामूहिक इस्तीफा

महासमुंद : महासमुंद जिले की धान समितियों के प्रबंधक और कंप्यूटर ऑपरेटर हड़ताल के पंद्रहवें दिन एक बड़ा और चौंकाने वाला कदम उठाया. राज्य सरकार के रवैए से गुस्साए हड़ताली कर्मचारियों ने लोहिया चौंक धरना स्थल पर तहसीलदार को अपना सामूहिक इस्तीफा सौंप दिया.
छत्तीसगढ़ की धरती पर ऐसा नजारा सामने आया जिसने शासन-प्रशासन की पूरी व्यवस्था को झकझोर दिया. सहकारी समिति कर्मचारी संघ रायपुर एवं समर्थन मूल्य धान खरीदी ऑपरेटर संघ के हजारों कर्मचारियों ने एक साथ सामूहिक इस्तीफा सौंपने का अभूतपूर्व फैसले लेकर प्रदेश में प्रशासनिक हलचल मचा दी है. इनकी 4 सूत्रीय मांगों की अनदेखी, आंदोलन को कुचलने की कोशिशें और दमनात्मक कार्रवाई ने कर्मचारियों को ऐसा कदम उठाने पर मजबूर कर दिया कि पूरा शासन तंत्र सकते में आ गया.
जिला सहकारी समिति कर्मचारी एवं कंप्यूटर ऑपरेटर संघ ने अपनी लंबित मांगों को लेकर चल रही अनिश्चितकालीन हड़ताल के 15वें दिन सामूहिक इस्तीफा महासमुंद तहसीलदार को सौंप दिया. संभाग स्तरीय धरना प्रदर्शन में जिले भर से हजारों कर्मचारी शामिल हुए. प्रदर्शनकारियों ने सरकार के खिलाफ जमकर नारेबाजी की और चेतावनी दी कि चार सूत्रीय मांगें पूरी होने तक आंदोलन जारी रहेगा.
जिले में बैठे हड़ताली कर्मचारियों के समर्थन में दीगर जिलों से सैकड़ों समिति सदस्य भी हड़ताल स्थल पर पहुंचे. धरने पर मौजूद कर्मचारियों ने अपनी चार-चार मांगों को लेकर सरकार के खिलाफ जोरदार नारोंबाजी की.
इस सभा में कर्मचारियों ने साफ किया कि उनकी मांगें अभी तक अनसुनी रही हैं. कर्मचारियों ने सरकार के रवैए पर अपनी गहरी नाराज़गी जताई. महासमुंद जिले में धान खरीदी कार्य सुचारु रुप से चलाने के लिए प्रशासन की लगातार कोशिशों के बावजूद कर्मचारियों का यह कदम सरकारी नीतियों और रवैए पर सवाल खड़ा करता है.
ये हैं संघ की चार प्रमुख मांगें
जिला सहकारी समिति कर्मचारी संघ की मांग है कि धान खरीदी वर्ष 2023-24 और 2024-25 की संपूर्ण सुखद राशि समितियों को प्रदान की जाए.
धान परिवहन में विलंब रोकने के लिए हर हफ्ते संपूर्ण धान परिवहन सुनिश्चित किया जाए.
धान खरीदी में शॉर्टेज, प्रोत्साहन, कमीशन, सुरक्षा व्यय बढ़ाया जाए और मध्यप्रदेश की तर्ज पर उचित मूल्य विक्रेताओं को 3000 प्रतिमाह मानदेय दिया जाए.
धान खरीदी नीति 2024-25 की कंडिका 11.3.3 के तहत आउटसोर्सिंग से ऑपरेटर की नियुक्ति खत्म कर विभागीय रुप से नियमितीकरण किया जाए.
सहकारी समिति कर्मचारी संघ के जिलाध्यक्ष का कहना है कि 3 नवंबर से संघ के सदस्य अनिश्चितकालीन धरने पर बैठे हैं. लेकिन अभी तक सरकार की तरफ से किसी भी तरह की सकारात्मक पहल नहीं की गई. जिसके बाद मजबूरन सामूहिक इस्तीफे का कदम उठाना पड़ा है. इसके बाद भी हमारी मांगों पर गौर नहीं किया गया तो हम लोग जेल भरो आंदोलन करेंगे.
वहीं तहसीलदार का कहना है कि कर्मचारियों ने सामूहिक इस्तीफा सौंपा है. जिसे उच्च अधिकारियों तक पहुंचा दिया जाएगा. धरने और सामूहिक इस्तीफे के बाद अब यह सवाल हर किसी के जेहन में है कि क्या राज्य सरकार कर्मचारियों की मांगों पर ध्यान देगी और जिले में धान खरीदी कार्य फिर से सुचारु होगा?
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संघर्ष की चिंगारी जो भड़की ज्वाला बन गई!
कहानी शुरु होती है 15 अक्टूबर 2025 से.. जब दोनों संगठनों ने संयुक्त रुप से बैठक कर अपनी लंबित मांगों को लेकर मुख्यमंत्री, मंत्रिमंडल, जिला प्रशासन और समिति प्राधिकृतों को लिखित ज्ञापन दिया. कर्मचारियों ने सरकार को पर्याप्त समय दिया. लेकिन नतीजा- “शून्य” मांगें पूरी नहीं हुईं तो-
•24 अक्टूबर 2025- जिला मुख्यालयों में विशाल धरना -प्रदर्शन और रैलियां हुईं.
•28 अक्टूबर 2025- सभी संभागीय आयुक्तों के माध्यम से फिर से ज्ञापन सौंपे गए.
इसके बावजूद शासन की चुप्पी ने कर्मचारियों के आक्रोश को और तेज कर दिया.
सरकार की चुप्पी टूटी, लेकिन आदेशों में आया ‘दमन!
मांगों पर फैसला तो नहीं आया. लेकिन सरकार की तरफ से जो आया… वह था एफआईआर, सेवा मुक्ति आदेश, दमनकारी नोटिस, और ESMA का डर...
कर्मचारी नेताओं ने बताया कि 15 से 20 प्रदेश पदाधिकारियों पर सेवा मुक्ति जैसे कठोर आदेश जारी किए गए. प्रदेश अध्यक्ष पर एफआईआर दर्ज कर उन्हें डराने-धमकाने की कोशिश की गई. शांतिपूर्वक धरना दे रहे कर्मचारियों को पुलिस थानों में बैठाया जा रहा है.
ESMA लगाकर आंदोलन को दबाने की कोशिश हो रही है. जबकि ESMA सिर्फ नियमित शासकीय कर्मचारियों पर लागू होता है. न कि संविदा या दैनिक वेतनभोगियों पर..कर्मचारियों ने सरकार से सवाल किया कि हम नियमित कर्मचारी नहीं, तो ESMA हम पर कैसे?”
संगठन के प्रदेश अध्यक्ष ने कहा कि हम अपराधी नहीं हैं कि ESMA लगाया जाए. हम वेतन मांगते हैं. अधिकार मांगते हैं… और जवाब में मिलता है थाना और FIR?”समस्या सिर्फ आंदोलन नहीं, यह भी है
धान सूखने पर समिति का कमीशन काटा जाता है.
•जबकि धान का उठाव समय पर न होना कर्मचारियों की गलती नहीं.
• कंप्यूटर ऑपरेटरों को सिर्फ 6 माह का वेतन.
•लेकिन काम पूरा साल करना पड़ता है. बाकी 6 महीनों में वह परिवार कैसे चलाए?
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सवालों के घेरे में सरकार, धान खरीदी की मशीनरी ठप होने का खतरा!

धान खरीदी हर साल करोड़ों किसानों का जीवन बदलती है. यही काम संभालते हैं. ये सहकारी समिति कर्मचारी और ऑपरेटर.. इनके बिना डेटाअपलोड, तौल, पंजीयन, टोकन, भुगतान सब रुक जाएगा.
अब जब सभी कर्मचारी सामूहिक इस्तीफा दे चुके हैं…
•क्या सरकार खुद धान खरीदी चलाएगी?
•क्या हजारों समितियों में काम ठप नहीं होगा?
•क्या लाखों किसान प्रभावित नहीं होंगे?         
•क्या जिसने कभी धान खरीदी नहीं की है वह 2 दिन में धान खरीदना सीख गया?
शासन के सामने अब स्थिति विस्फोटक है.आंदोलन एक चेतावनी नहीं. एक प्रदेश-व्यापी ‘जन-आक्रोश’ है.
कर्मचारियों ने साफ कहा कि हम धान खरीदी से अलग रहेंगे. जब तक हमारी मांगें नहीं मानी जातीं. अब यह संघर्ष सिर्फ वेतन या मांगों का नहीं, यह सम्मान, अधिकार और न्याय का संघर्ष बन चुका है.
प्रदेश की नियति निर्णायक मोड़ पर!
रायपुर से उठा यह भूचाल आने वाले दिनों में बड़े प्रशासनिक संकट का संकेत है. 2058 समितियों का सामूहिक इस्तीफा सिर्फ एक पत्र नहीं. यह सरकार के सामने खड़ी हजारों परिवारों की बेबसी और दमन के खिलाफ गूंजती चेतावनी है. अब गेंद शासन के पाले में है. समाधान निकलेगा या संघर्ष और उग्र होगा?
छत्तीसगढ़ की जनता की नज़रें उसी पर टिकी हैं.
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