भारत-अमेरिका व्यापार समझौता -किसानों और आम जनता के हितों पर गंभीर हमला, 27 फरवरी को राज्यपाल व CM से चर्चा, 9 मार्च को ग्राम स्तर पर अभियान

India-US trade agreement – ​​a serious attack on the interests of farmers and the general public. Discussion with the Governor and Chief Minister on February 27th, and a village-level campaign on March 9th.

भारत-अमेरिका व्यापार समझौता -किसानों और आम जनता के हितों पर गंभीर हमला, 27 फरवरी को राज्यपाल व CM से चर्चा, 9 मार्च को ग्राम स्तर पर अभियान

रायपुर : भारत और अमेरिका के बीच घोषित अंतरिम व्यापार समझौते (ITA) को सरकार “ऐतिहासिक” बता रही है. लेकिन जमीनी स्तर पर यह समझौता किसानों, मजदूरों, छोटे उद्योगों और आम जनता की हितों के लिए गंभीर चिंताओं को जन्म देता है.
अमेरिका-भारत व्यापार समझौता जन विरोधी कदम है. भारत की आत्मा गांव में बसती है. लेकिन जिस तरह से यह व्यापार समझौता की संयुक्त घोषणा सामने आया है. उससे सबसे बड़ा सवाल यह है कि किसानों की सहमति लिए बिना उनकी सुरक्षा को ताक में रख कर कृषि को कॉरपोरेट घरानों के हाथों में सुपुर्दगी सुनिश्चित कर दी है.
प्रेस क्लब रायपुर में पत्रकार वार्ता को सम्बोधित करते हुए संयुक्त किसान मोर्चा (SKM) छत्तीसगढ़ के संयोजक सदस्यों जनकलाल ठाकुर, तेजराम विद्रोही, गौतम बंधयोपाध्याय, नरोत्तम शर्मा, रमाकांत बंजारे ने चिंता जाहिर करते हुए कहा कि समझौते की घोषणा में गैर-शुल्क बाधाओं को कम करने और कृषि व्यापार को बढ़ाने की बात कही गई है. इससे अमेरिकी कृषि उत्पादों के लिए भारतीय बाजार खुल सकता है. अमेरिकी कृषि भारी सब्सिडी पर आधारित है, जिससे भारतीय किसान प्रतिस्पर्धा में कंही भी नजर आने वाले हैं. सस्ती विदेशी उपज से भारतीय किसान तबाह होंगे. अमरिका की खेती भारी सब्सिडी पर आधारित, पूरी तरह मशीनीकृत और बड़े कॉर्पोरेट फार्म मॉडल पर आधारित है. अगर भारत सोयाबीन, ज्वार,मक्का, गेंहूँ, फलों, डेयरी उत्पाद, दालों पर आयात शुल्क घटाता है. तो सस्ती अमेरिकी फसल भारतीय मंडियों में आएगी. इससे भारतीय किसान जो पहले ही एममसपी की लड़ाई लड़ रहा है. वह इस प्रतिस्पर्धा में कैसे टिकेगा?
500 अरब डॉलर आयात लक्ष्य आत्मनिर्भरता पर सवाल खड़ा करता है क्योंकि भारत द्वारा अगले पाँच साल में 500 अरब डॉलर के अमेरीकी सामान आयात करने का संकेत, ऊर्जा, तकनीक और कृषि क्षेत्र में विदेशी निर्भरता बढ़ा सकता है. इससे स्थानीय उद्योग और स्वदेशी उत्पादन प्रभावित होने वाले हैं. 
डेयरी सेक्टर पर सीधा हमला होगा. भारत का डेयरी मॉडल छोटे और सीमांत किसानों पर आधारित, सहकारी व्यवस्था पर टिका हुआ है. मांस युक्त पशु आहार जैसी अमेरिकी डेयरी उत्पादों की आसानी से प्रवेश होने से लाखों दुग्ध उत्पादक परिवार प्रभावित होंगे. जो कि ग्रामीण अर्थव्यवस्था पर सीधा हमला है.
व्यापार संतुलन के नाम पर भारत के ऊपर कृषि सब्सिडी कम करने, सार्वजनिक खरीद प्रणाली को कमजोर करने का दबाव होने से एमएसपी व्यवस्था, सार्वजनिक वितरण प्रणाली और खाद्य आत्मनिर्भरता पर हमला होगा.
अमेरिकी कंपनियां पेटेंट आधारित बीज, बौध्दिक संपदा अधिकार के जरिये अपने किसानों को आत्मनिर्भर बनाती है. जबकि भारत में आज भी किसान अपनी परंपरिक बीज संचय और संरक्षण पर निर्भर है. बीज पर कंपनियों का नियंत्रण होने से भारतीय किसान अपनी परंपरिक बीज स्वतंत्रता और नियंत्रण खोते जा रहा है.
इसलिए यह समझौता सिर्फ व्यापार का मामला नहीं है बल्कि यह किसान की आय, ग्रामीण रोजगार, खाद्य सुरक्षा, राष्ट्रीय आर्थिक स्वायत्तता का सवाल है.
छत्तीसगढ़ के संदर्भ में संयुक्त किसान मोर्चा(SKM) के संयोजक सदस्यों ने कहा कि छत्तीसगढ़ के किसानों को केंद्र द्वारा न्यूनतम समर्थन मूल्य में हुए बढ़ोतरी के साथ धान पर 3286 रूपये प्रति क्विंटल की दर से अंतर की राशि मिलनी चाहिए. पिछली सरकार का एक किस्त जो बकाया है. वह भी किसानों को मिले. और न्यूनतम समर्थन मूल्य की सी- 2 +50% के साथ कानूनी गारंटी लागू होनी चाहिए. 
उन्होंने आगे कहा कि आंगनबाड़ी, रसोईया संघ, बीएड डीएड संघ, विकलांग संघ एवं आवास संघर्ष समिति आदि के साथ साथ नागरिकों का आंदोलन जैसे लिंगाडीह बचाओ आंदोलन, तमनार रायगढ़, हसदेव, बैलाडीला जैसे आंदोलन जो जल जंगल जमीन और पर्यावरण बचाने के लिए जारी है उनकी जल्द सुनवाई कर समाधान निकाला जाना चाहिए. इसके बजाय राज्य सरकार उनका दमन करते हुए उन्हें जेल भेज रही है. जानबूझकर उन्हें हिंसक आंदोलन में बदलकर आंदोलन को तोडना चाहती है. जो शर्मनाक है.
 उन्होंने बताया कि भारत अमेरिका व्यापार समझौता के विषय पर 27 फरवरी को राज्यपाल और मुख्यमंत्री से मुलाक़ात कर किसानों की चिंता से अवगत कराएंगे. ताकि भारत सरकार समझौता पर हस्ताक्षर न करे. इसके लिए किसानों की चिंता का पत्र भारत सरकार को राज्यपाल व मुख्यमंत्री छत्तीसगढ़ शासन की तरफ से भेजा जाना चाहिए. 
9 मार्च को इस संबंध में ग्राम स्तर पर अभियान चलाकर भारत अमेरिका व्यापार समझौता से कृषि, किसान और आम उपभोक्ता को होने वाली संभावित दुष्परिणाम से लोगों को अवगत कराया जायेगा. और अप्रैल में व्यापक कन्वेंशन आयोजित की जाएगी. जिसमें राष्ट्रीय स्तर से कृषि विशेषज्ञ और संयुक्त किसान मोर्चा के नेतागण शिरकत करेंगे. अगर सरकार किसानों और आम जनता के हितों की अनदेखी कर समझौते पर दस्तखत कर लागू करती है तो देशभर में शांतिपूर्ण आंदोलन चलाया जाएगा.
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